अध्याय 5 / 11
सिविल नाफ़रमानी स्थगित, पुनः कौन्सिल प्रवेश
1934–38
यह पुस्तक १९७४ में हिंदी में लिखी गई थी और यहाँ ठीक वैसे ही प्रस्तुत है जैसे प्रकाशित हुई थी — इसका अनुवाद नहीं किया गया है। मेनू व नेविगेशन भाषा बदलते हैं; पुस्तक का पाठ नहीं बदलता।
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फतेहगढ़ जेल की वापसी पर बदायूँ में वातावरण
१९३३ में जब रघुवीर सहाय फतेहगढ़ जेल से व उनके साथी, जो अन्य जेलों में बन्द थे, छूटकर आये तब बदायूँ में वातावरण देश के अन्य स्थानों की भांति निराशावादी व उदासीनता का था। ऐसा मालूम पड़ता था कि ब्रिटिश सरकार की कठोर दमन नीति के कारण कांग्रेस संस्था कुचल-सी दी गई थी। लोगों की हिम्मत टूट सी गई थी, क़ानून तोड़ने का वातावरण नहीं दिखाई देता था। यद्यपि आर्डिनेन्स बराबर जारी थे, सिविल नाफ़रमानी जैसी चीज़ बिलकुल बे मौक़ा मालूम पड़ती थी। उन्होंने लम्बे जेल की अवधि में ही अपने विचार बना लिये थे। जिनको छूटने के बाद २८ अप्रैल, १९३४ के 'लीडर' में प्रकाशित कराये। उसमें साफ़-साफ़ यह बात कही कि कांग्रेस को इस समय अपना प्रोग्राम बदलना चाहिये, रचनात्मक कार्य की ओर ध्यान देना चाहिये और इसके साथ ही साथ नई कौन्सिलों व एसेम्बली जो बनने वाली हैं, उनमें कांग्रेस को अपने आदमी भेजने चाहियें।
ब्रिटिश शासन की ओर से व्हाइट पेपर का प्रकाशन
गांधी जी ने स्वयं स्थिति का अध्ययन कर मई १९३४ में सिविल नाफ़रमानी आन्दोलन को बन्द कर दिया। इधर यह प्रतीत होने लगा कि तीसरी गोलमेज कान्फ्रेन्स के बाद जो व्हाइट पेपर ब्रिटिश गवर्नमेन्ट की ओर से प्रकाशित किया गया है कि सरकार स्वायत्त शासन केन्द्र में न देकर बहुत मात्रा में प्रदेशीय विधान सभाओं को देने जा रही है और उसके आधार पर एक बिल पार्लियामेन्ट में पेश कर रही है जो शीघ्र ही पास हो जावेगा क्योंकि इस बिल के मुख्य उद्देश्यों के सम्बन्ध में इंग्लैण्ड की सभी राजनैतिक पार्टियाँ एक मत थीं।
बिहार का भूकम्प
१९३४ के जनवरी मास में बिहार का भूकम्प आया जिसके कारण बिहार को भारी क्षति पहुँची। देश के सभी भागों में कांग्रेस द्वारा सहायता इकट्ठा करना आरम्भ कर दिया गया। बदायूँ में भी इसके लिए धन संग्रह किया गया जो बाद को राजेन्द्र बाबू के पास बिहार भेज दिया गया।
समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए लेखों की सूची
कौंसिल प्रवेश और उनमें जाकर मन्त्री पद ग्रहण करने के पक्ष में रघुवीर सहाय ने अनेक लेख लिख-लिख कर समाचार पत्रों में प्रकाशित कराये। इन लेखों की सूची इस प्रकार है :—
| लेख का शीर्षक | समाचार पत्र व तिथि |
|---|---|
| कांग्रेस और कौंसिलें | 'लीडर' में २८ दिसम्बर, '३३ को व 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में २९ दिसम्बर, '३३ को |
| स्वराज्य पार्टी को फिर से चालू किया जाय | 'लीडर' में ८ अप्रैल, '३४ को |
| इसी आशय का दूसरा लेख | 'लीडर' में २० अप्रैल '३४ को |
| कांग्रेस व कौंसिलें (नोट—यह लेख फतेहगढ़ डिस्ट्रिक्ट जेल में लिखा गया था पर जेल से छूटने के बाद प्रकाशित हुआ) | 'लीडर' में २८, ३० अप्रैल, १९३४ को |
| कांग्रेस व कौंसिलों के चुनाव | 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में २२ सितम्बर, '३४ को |
| कांग्रेस और पद स्वीकार करने के बारे में | 'लीडर' में १४ जून, '३५ को; 'लीडर' में ७ सितम्बर, '३५ को; 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में २१ सितम्बर व १० अक्तूबर, १९३५ को |
| पद स्वीकार किये जावें अथवा नहीं | 'लीडर' में ६ मार्च, १९३६ को |
चुनावों में भाग लेने के सम्बन्ध में वातावरण
फलस्वरूप देश में एक वातावरण कांग्रेस चुनावों में भाग लेकर पद ग्रहण करे इसके बारे में बना। इस सम्बंध में और भी लेख समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए और आम चर्चा का विषय बन गये। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के पटना अधिवेशन में, जहाँ गांधी जी स्वयं उपस्थित थे, २० मई १९३४ को कांग्रेस चुनावों में भाग ले, इस आशय का प्रस्ताव पास किया गया। इस अधिवेशन में रघुवीर सहाय ने भी भाग लिया।
पन्त जी द्वारा उम्मीदवारों का चयन
पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त जब यह जानकारी प्राप्त करने बदायूँ आये कि जिले से किन व्यक्तियों को उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए कांग्रेस की ओर से उम्मीदवार बनाया जाये तो उनके सामने बहुत से नाम पेश किये गये, तब प्रार्थना-पत्र नहीं मांगे जाते थे और न कोई डिपाजिट की रक़म तलब की जाती थी। पन्त जी को स्वयं भी यहाँ की स्थिति का परिचय था, वह इससे पहले भी कई बार बदायूँ आ चुके थे। यहाँ से दो नान मुस्लिम व एक हरिजन उम्मीदवार विधान सभा के लिए तलाश करने थे। अन्त में उन्होंने चौधरी बदन सिंह व कुँवर रुकुम सिंह का दो नान मुस्लिम स्थानों के लिये व श्री लाखन दास (शाहजहाँपुर) को हरिजन स्थान के लिये नामज़द किया। इन तीनों नामों की बाद में उ० प्र० कांग्रेस पार्लियामेन्टरी बोर्ड ने स्वीकृति दे दी।
हरिजनों के लिए पृथक निर्वाचन पद्धति का सुझाव, गांधी जी का अनशन
हरिजन सीट प्रथम बार उ० प्र० विधान सभा में नये गवर्नमेन्ट आफ़ इण्डिया एक्ट १९३५ के अनुसार रखी गई थी। दूसरी गोल मेज कान्फ्रेन्स में जब महात्मा गांधी भाग लेने इंग्लैण्ड गये थे तब उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि वह किसी भी क़ीमत पर हरिजनों को पृथक निर्वाचन पद्धति द्वारा विधान सभाओं में भेजने के लिए तैयार नहीं होंगे। यदि पृथक निर्वाचन की प्रणाली निश्चय की गई तो वह अपनी जान की बाज़ी लगा देंगे। रेम्ज़े मैकडानेल्ड ने, जो उस समय इंग्लैण्ड के प्राइम मिनिस्टर थे, यह निर्णय दिया कि हरिजनों को पृथक निर्वाचन द्वारा विधान सभाओं में स्थान दिया जाये। फलस्वरूप गांधी जी ने, जो उस समय जेल में थे, आमरण अनशन का निश्चय कर अपना अनशन प्रारम्भ कर दिया। सारे देश में इस ख़बर के फैलने से एक हलचल मच गई और इसके प्रयत्न होने लगे कि गांधी जी का जीवन बचाया जाय। सभी सम्प्रदायों के प्रतिनिधियों ने इकट्ठा होकर, जिसमें डाक्टर अम्बेडकर हरिजनों के प्रतिनिधि भी थे, यह समझौता कर लिया कि हरिजनों के लिये विधान सभाओं में अमुक स्थान सुरक्षित रखे जायें और उनको अन्य सुविधायें भी उपलब्ध कराई जायें। इस प्रकार पृथक निर्वाचन की पद्धति को अस्वीकार किया गया। पर क़ानून में ऐसा प्राविधान रखा गया कि हरिजन उम्मीदवार पहले हरिजनों के मत द्वारा चुने जायें और बाद में सभी नान मुस्लिम वोटर उनके लिये मत दें। इसके फलस्वरूप प्रत्येक नान मुस्लिम मतदाता को दो राय देने का अधिकार प्राप्त हुआ। बदायूँ के उम्मीदवारों के नाम उ० प्र० कांग्रेस पार्लियामेन्टरी बोर्ड के द्वारा मन्ज़ूर हो जाने के बाद पन्त जी फिर बदायूँ आये। रघुवीर सहाय व चौधरी तुलसी राम के साथ जिले भर का दौरा कर कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में वोट देने को कहा। एक वातावरण कांग्रेस के पक्ष में वोट देने को तैयार हुआ। अपने दौरे की समाप्ति पर पन्त जी ने रघुवीर सहाय व चौधरी तुलसीराम से कहा कि बदायूँ जिले के तीनों कांग्रेस उम्मीदवारों को कामयाब बनाया जाय, पर विशेष रूप से कांग्रेस हरिजन उम्मीदवार का ध्यान रखा जाय।
दातागंज क्षेत्र में भ्रमण व ठाकुर नरायन सिंह की लोकप्रियता
चुनाव तैयारियाँ ज़ोरों से जिले भर में प्रारम्भ हो गईं। रघुवीर सहाय व कुँवर रुकुम सिंह दातागंज तहसील का दौरा करने के लिए रवाना हो गये। पूर्व दक्षिण के कोने पर खेड़ा जलालपुर से लेकर उत्तर पूरब के कोने पर धगया तक बैलगाड़ी द्वारा सफ़र कर गांव-गांव में जाकर लोगों से मिलकर, कांग्रेस के पक्ष में मत प्राप्त करने का प्रयत्न किया। पर उन दोनों को ऐसा प्रतीत हुआ कि जहाँ तक कुँवर रुकुम सिंह का सम्बन्ध है, अधिकांश लोग उनके पक्ष में नहीं मालूम देते थे। इसका कारण यह था कि उनके ख़िलाफ़ ठाकुर नरायन सिंह सबलपुर वाले खड़े हो गये थे। वह उस क्षेत्र के ही रहने वाले थे, बड़े प्रभावशाली व्यक्ति थे, बड़े ही ईश्वर भक्त, भले मानस और सज्जन होने के कारण सारे क्षेत्र के लोग उनका आदर करते थे। लोग किसी तरह भी उनके ख़िलाफ़ वोट देने को तैयार नहीं थे। और बहुतों ने खुल्लम खुल्ला कह दिया कि वह ठाकुर नरायन सिंह के ख़िलाफ़ राय नहीं देंगे चाहे कांग्रेस उम्मीदवार कोई हो।
पंडित जवाहर लाल नेहरू का बदायूँ आना चुनाव के लिए
दातागंज क्षेत्र का दौरा समाप्त करने के बाद बदायूँ लौटने पर रघुवीर सहाय ने अपने मित्रों को इकट्ठा कर यह सब स्थिति बताई। सभी मित्रों ने तब एक आवाज़ से यह सलाह दी कि ऐसी सूरत में पं० जवाहर लाल नेहरू को बदायूँ अवश्य बुलाया जाय और इस काम के लिए रघुवीर सहाय तुरन्त लखनऊ जाकर उ० प्र० के प्रोग्राम में पंडित जी का बदायूँ आना अवश्य शामिल करायें। इस निर्णय के बाद रघुवीर सहाय लखनऊ के लिए रवाना हो गये, वहाँ पहुँच रफ़ी अहमद किदवई, जो चुनाव अभियान के संचालक थे, उनसे मिले और बदायूँ की पूरी स्थिति उन्हें बताई। रफ़ी अहमद उस समय एक चारपाई पर बैठे हुए थे और बराबर टेलीफ़ोन खटका रहे थे। पं० जवाहर लाल नेहरू को अपने-अपने जिलों में ले जाने के लिए लोगों की भीड़ वहाँ उपस्थित थी। रफ़ी साहब ने एक प्रोग्राम पंडित जी के उ० प्र० में भ्रमण का बना लिया था जो उन्होंने रघुवीर सहाय को दिखाया और कहा कि इस प्रोग्राम में बदायूँ की गुंजायश नहीं है। प्रोग्राम में बदायूँ का नाम नहीं था। बहुतेरे समझाने-बुझाने पर भी रफ़ी साहब बदायूँ को शामिल करने पर तैयार नहीं हुए। तब रघुवीर सहाय बड़े निराश हुए। रफ़ी साहब से कुछ गर्मा-गर्मी भी हो गई, पर रफ़ी साहब बड़ी नरम प्रकृति के थे, बराबर मुस्कराते रहे। इतने में वहाँ पन्त जी भी आ गये। रघुवीर सहाय ने तब उन्हें बदायूँ की सब स्थिति से अवगत कराया और कहा कि कुँवर रुकुम सिंह को कामयाब बनाने के लिए पं० जवाहर लाल नेहरू का बदायूँ आना अत्यन्त आवश्यक है, पर यहाँ रफ़ी साहब इसके लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। पन्त जी बदायूँ की हालत खूबी जानते थे क्योंकि वह स्वयं घूम चुके थे। उन्होंने रघुवीर सहाय की राय से सहमति प्रकट कर रफ़ी साहब से कहा कि जो प्रोग्राम पंडित जी के दौरे का उ० प्र० के लिए वह बना रहे हैं उसमें बदायूँ को अवश्य शामिल किया जावे।
हिमालयन ट्रांसपोर्ट कम्पनी द्वारा हवाई जहाज़ प्राप्त
इसके जवाब में रफ़ी साहब ने कहा कि यह तब ही सम्भव हो सकता है जब पं० जवाहर लाल नेहरू बदायूँ हवाई जहाज़ से पहुँचें और हवाई जहाज़ का ख़र्चा रघुवीर सहाय देने को तैयार हों। रघुवीर सहाय ने यह शर्त मान ली, रफ़ी साहब ने उसी समय देहली हिमालयन ट्रांसपोर्ट कम्पनी को फ़ोन से बात करके तै कर दिया कि अमुक तारीख़ को जवाहर लाल जी बिजनौर से हवाई जहाज़ द्वारा बदायूँ पहुँचेंगे और ख़र्चे के ४००) रु० रघुवीर सहाय को देने पड़ेंगे।
ख़बर बिजली की तरह फैल गई
रघुवीर सहाय के बदायूँ वापस आने पर जब उन्होंने अपने मित्रों को यह सब हाल बताया तब सबको बड़ा हर्ष हुआ और पंडित जी के हवाई जहाज़ द्वारा बदायूँ आने का समाचार जिले भर में बिजली की तरह फैल गया।
हवाई जहाज़ का एक दिन पहले आकर स्थान का निरीक्षण करना
पंडित जी का हवाई जहाज़ उतारने के लिए मिलिट्री कैम्पिंग ग्राउण्ड (बारह पत्थर) जो बदायूँ नगर के उत्तर की ओर लगभग दो मील की दूरी पर बरेली को जाने वाली सड़क के किनारे है, रखा गया, इसकी भी सूचना रघुवीर सहाय ने रफ़ी साहब को भेज दी। वह स्वयं उस जगह को देखने गये। बदायूँ इससे पहले कभी हवाई जहाज़ नहीं उतरा था। यद्यपि आकाश में उड़ते हुए कभी-कभी दिखाई दे जाते थे। निश्चित तिथि से एक दिन पहले किसी ने रघुवीर सहाय को बताया कि पंडित जी हवाई जहाज़ से आ गये हैं और उनका हवाई जहाज़ बारह-पत्थर पर उतरा है। यह सुनकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ कि हवाई जहाज़ एक दिन पहले कैसे आ गया। उन्होंने तुरन्त अपनी डायरी को निकाला और देखा कि कहीं तारीख़ में ग़लती तो नहीं हो गई है पर उसके देखने से मालूम हुआ कि पंडित जी के आने की तारीख़ आज नहीं, कल की है। फिर वह जल्दी से बारह-पत्थर पहुँचे, वहाँ देखा कि एक छोटा सा हवाई जहाज़ ज़मीन पर उतरा खड़ा है और उसके पास उसका पायलट और चारों तरफ़ लड़कों की भीड़। दरयाफ़्त करने पर पायलट ने बताया कि पंडित जी कल इसी समय बिजनौर से यहाँ पहुँचेंगे, वह आज केवल स्थान देखने के लिए आये हैं। उन्होंने कहा कि ज़मीन पर जो बैलगाड़ियों के चलने के कारण पहियों के गड्ढे बन गये हैं वह इकसार करा दिये जावें ताकि हवाई जहाज़ आसानी से उतर सके। उस समय चौधरी सल्लन मियाँ, जो उसी स्थान के पास रहते थे, और एक बड़े जमींदार थे, वह भी वहाँ पहुँच गये थे। उन्होंने गड्ढों को ठीक कराने का काम अपने जिम्मे लेकर, ठीक करा दिया।
पंडित जी का हवाई जहाज़ द्वारा पहुँचना व भीड़ का हवाई-जहाज़ पर टूट पड़ना
अगले दिन बारह-पत्थर पर लगभग बीस हज़ार स्त्री-पुरुष बच्चे शहर व देहात से हवाई जहाज़ के आने से पहिले पहुँच गये और सारे मैदान में फैल गये। कलक्टर व कप्तान की ओर से कोई भी प्रबन्ध नहीं किया गया। जब तक हवाई जहाज़ आकाश में दिखाई नहीं दिया उस समय तक भीड़ शान्त रही। पर जैसे ही हवाई जहाज़ ने मँडराना शुरू किया तभी भीड़ तितर-वितर होकर बीच मैदान में इधर-उधर भागने लगी जिसके कारण हवाई जहाज़ को नीचे उतरने में काफ़ी देर लगी। जैसे-जैसे हवाई जहाज़ उतरा, एकदम भीड़ उसके ऊपर टूट पड़ी। रघुवीर सहाय व उनके साथी एक ओर को खड़े यह सब देख रहे थे। उनका हवाई जहाज़ तक पहुँचना असम्भव हो गया। उन दिनों छोटे-छोटे हवाई जहाज़ों का बाहर का कवरिंग कैनवास का होता था। हवाई जहाज़ जो पंडित जी को लाया था, टू सीटर प्लेन था। भीड़ के चारों ओर से हवाई जहाज़ को घेर लेने के कारण पंडित जी का उससे उतरना मुश्किल पड़ गया। वह इतने परेशान हो गये थे कि भुंभलाहट में मुश्किल से बाहर निकल कर जो भीड़ उन्हें घेरे हुए थी, उसके हाथों में से एक लाठी छीनकर ज़ोर-ज़ोर से चारों ओर घुमाने लगे जिसकी वजह से भीड़ पीछे की ओर हटने लगी। कुछ के चोटें भी आ गईं। तब रघुवीर सहाय ने आगे बढ़कर पंडित जी को नमस्कार किया। पंडित जी ग़ुस्से में आग बबूला होकर बोले "बदायूँ के सब लोग बड़े नालायक़ हैं। मैं अभी वापस चला जाऊँगा, यहाँ कोई इन्तज़ाम नहीं है।" इतने में ही लम्बे-चौड़े शहर कोतवाल की शक्ल दिखाई पड़ी। तब रघुवीर सहाय ने पंडित जी से कहा कि वह और उनके गिने चुने वालिन्टियर्स इतनी बड़ी भीड़ को कैसे क़ाबू में रख सकते थे। बदायूँ की पुलिस ने कोई इन्तज़ाम नहीं किया। कोतवाल तो अभी दिखाई पड़े हैं।
पंडित जी के लिए प्रोग्राम की कापी दी गई
जब पंडित जी कुछ शान्त हुए तब रघुवीर सहाय ने उनको प्रोग्राम बताया और एक टाइप किया हुआ काग़ज़ उनके हाथ में दे दिया और कहा कि वह और कुँवर रुकुम सिंह एक कार में बैठकर सीधे दातागंज, जो वहाँ से १८ मील के फ़ासले पर है के लिए रवाना हों, जहाँ पब्लिक मीटिंग का प्रबन्ध किया गया है।
पंडित जी दातागंज की ओर न जाकर दूसरे रास्ते चल पड़े
रघुवीर सहाय को अपनी मोटर, जिसमें वह दातागंज अन्य मित्रों के साथ जा रहे थे, तलाश करने में कुछ देरी हो गई, भीड़ काफ़ी थी। जब वह बैठकर रवाना हुए और राम नरायन आश्रम के सामने पहुँचे जो रास्ते पर था जहाँ के व्यवस्थापकों को वह बता चुके थे कि जब पंडित जी की कार उनके आश्रम से होकर गुज़रे तो वह उसको रोक कर पंडित जी को फूल मालायें पेश करदें। इसी तरह आगे बढ़कर गुरुकुल सूर्यकुण्ड के पास भी। तब उन्होंने देखा कि विद्यार्थी फूल मालाएँ लिये खड़े हुए हैं। दरयाफ़्त करने पर रघुवीर सहाय को उन लोगों ने बताया कि पंडित जी की कार अभी तक इधर से नहीं गुज़री। तब उन्हें बड़ी फ़िकर हुई। फिर भी वह आगे बढ़े और गुरुकुल के सामने भी विद्यार्थियों की भीड़ को देखकर दरयाफ़्त करने पर मालूम हुआ कि पंडित जी की कार इधर से नहीं गई है। थोड़ी दूर और आगे बढ़कर एक क्रासिंग पर कोतवाल शहर खड़े हुए थे उनसे दरयाफ़्त करने पर मालूम हुआ कि पंडित जी की कार अभी इधर नहीं आई है, तब मायूस होकर रघुवीर सहाय ने अपनी कार बदायूँ की ओर वापस कराई और अपने मकान पर ले चलने को कहा। वह सोचने लगे कि पंडित जी का ग़ुस्सा अभी शान्त नहीं हुआ है कहीं वह बदायूँ से वापस न चले गये हों।
पंडित जी का रघुवीर सहाय के मकान पर पहुँचकर चाय पीना
जब रघुवीर सहाय अपने स्थान पर पहुँचे तो देखा कि पंडित जी की कार खड़ी है। उनका बड़ा कमरा खुला हुआ है, जिसमें स्वयं पंडित जी विराजमान हैं। उनके दरयाफ़्त करने पर कि आपको तो दातागंज पहुँचना था जहाँ सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया है, आप यहाँ कैसे आ गये। पंडित जी ने मुस्कराते हुए कहा कि "मुंशी जी, आप नहीं जानते हैं कि जब कोई भला मानस आदमी शाम के ४ बजे के समय किसी दूसरी जगह सफ़र करके पहुँचता है तो उसको एक चाय के प्याले की ज़रूरत होती है, आपने मुझसे चाय के लिए पूछा नहीं इस लिए मैंने स्वयं इन्तज़ाम कर लिया है।" उन्होंने मकान पर पहुँच कर तुरन्त श्रीमती रघुवीर से पानी गर्म करने के लिए कहा और चाय बनाने के लिए जब तक रघुवीर सहाय वहाँ पहुँचे वह चाय पी रहे थे और कहा कि अब मैं सफ़र के लिए तैयार हूँ।
पंडित जी का दातागंज में आगमन
दातागंज के पास जब कार पहुँची तो देखा कि गांव के लोग मीटिंग के स्थान से इन्तज़ार करने के बाद वापस अपने गांव को जा रहे थे। रघुवीर सहाय ने अपनी कार को रोक कर बताया कि पंडित जी आ गये हैं। अब सब लोग वापस चलें। मीटिंग के स्थान पर लगभग २० हज़ार आदमी उपस्थित थे तब लाउडस्पीकर का रिवाज नहीं था। पंडित जी ने उनको सम्बोधित कर थोड़े शब्द कहे जो जनता ने बड़ी उत्सुकता से सुने। पर लोग तो उनके दर्शन के इच्छुक थे। जब तक पंडित जी उनको सम्बोधित करते रहे वह उनको स्नेह भरी निगाहों से देखते रहे। भाषण के पश्चात जब पंडित जी मंच से नीचे उतरने लगे तो उस समय ठाकुर नारायन सिंह जो मंच के नीचे खड़े हुए थे, कह रहे थे कि "पंडित जी दातागंज क्या आये हमारी तो कबर खुद गई"। ऐसा ही हुआ। चुनाव में कुँवर रुकुम सिंह विजयी हुए। पंडित जी ने दातागंज से वापस आकर रात को बदायूँ में एक सार्वजनिक सभा को सम्बोधित किया और तत्पश्चात रेल द्वारा भाँसी के लिए रवाना हो गये।
हवाई जहाज़ नाकारा
जिस हवाई जहाज़ से पंडित जी बदायूँ आये थे, वह भीड़ के आक्रमण के कारण नाकारा हो गया था। उसका पायलट उसको छोड़कर देहली वापस चला गया, वहाँ से मेकेनिक को अपने साथ लेकर अगले दिन जहाज़ दुरुस्त कराके वापस ले गया।
मतदान दिवस के लिए कार्यकर्ताओं की नियुक्ति
पंडित जी के बदायूँ आने से कांग्रेस उम्मीदवारों की कामयाबी निश्चित हो गई थी। कांग्रेस उम्मीदवारों में पं० गोविन्द बल्लभ पन्त भी थे जो चार शहरों की सीट से विधान सभा के लिए खड़े हुए थे। जब मतदान का समय आया तब रघुवीर सहाय व चौधरी तुलसीराम ने कुँवर रुकुम सिंह व श्री लाखनदास के क्षेत्र में हर पोलिंग स्टेशन के लिए कार्यकर्ताओं को नियुक्त कर और उनको आवश्यक सामग्री देकर उनके स्थानों के लिए रवाना कर दिया।
गुलड़िया पोलिंग स्टेशन पर सियाराम वकील व उनकी स्त्री का पहुँचना
गुलड़िया पोलिंग स्टेशन भी इस क्षेत्र में था। उसमें अधिकांश लोग कुर्मी बिरादरी के थे, जिस बिरादरी के कुँ० रुकुम सिंह स्वयं थे। इस पोलिंग स्टेशन पर काम करने के लिए श्री सियाराम वकील व उनकी पत्नी को एजेन्ट बनाकर भेजा गया और उनको बता दिया गया कि वह प्रत्येक वोटर का एक वोट कु० रुकुम सिंह व दूसरा वोट श्री लाखन दास के पक्ष में डलवायें। श्री सियाराम तथा उनकी पत्नी एक दिन पहले ही गाँव में पहुँच गये। रात को वहीं ठहरे और गांव वालों को बता दिया कि किस प्रकार वोटिंग कराई जायगा। फलस्वरूप गांव वालों ने उनको अगले दिन सबेरे कोठरी में ही बन्द रखा। कोठरी में ताला लगाकर उनको बाहर नहीं निकलने दिया। वोटिंग शुरू होने पर गाँव वालों ने दोनों वोट प्रत्येक वोटर से कुँवर रुकुम सिंह के पक्ष में ही डलवाना शुरू कर दिये। लाखन दास को कोई भी वोट नहीं डलवाया गया। कुछ समय बीतने के बाद जब गांव वालों को निश्चय हो गया कि अब उनके मंशा के अनुसार ही राय डाली जायगी तब सियाराम व उनकी पत्नी को कोठरी के बाहर निकाल बदायूँ लौट आने पर मजबूर कर दिया। वह कुछ ही समय बाद बदायूँ वापस आ गये।
रघुवीर सहाय द्वारा उभयानी पोलिंग स्टेशन को सूचना भेजना कि दोनों वोट लाखन दास के पक्ष में डाले जावें
बदायूँ आने पर उन्होंने सब हाल रघुवीर सहाय को बतलाया चौधरी तुलसी राम उस समय तक उभयानी की तरफ चले गये थे। रघुवीर सहाय ने तुरन्त एक लिखित सूचना श्री सतीश चन्द्र वकील के पास, जो उभयानी में काम कर रहे थे, भेजी कि वह अपने पोलिंग स्टेशन पर और आस पास के पोलिंग स्टेशनों पर दोनों मत लाखन दास के पक्ष में डलवाना शुरू कर दें और वह उस समय तक जारी रखें जब तक उनको विश्वास न हो जाय कि लाखन दास के पक्ष में काफ़ी मत पड़ गये हैं और उनकी कामयाबी निश्चित है। उसके बाद एक-एक वोट के डलवाने का तरीक़ा प्रारम्भ कर दें। सतीश चन्द्र ने ऐसा ही किया और आस पास के पोलिंग स्टेशनों पर इसकी सूचना भिजवा दी। उन्होंने भी इसी के अनुसार अपने-अपने पोलिंग पर राय डलवाई। इसका परिणाम यह हुआ कि मतगणना के समय कु० रुकुम सिंह व श्री लाखनदास दोनों ही विजयी हुए। तीसरे चौधरी बदन सिंह भी विजयी घोषित कर दिये गये। विधान सभा के लिए चुनाव में शत प्रतिशत सफलता जिले में प्राप्त हुई। चारों शहरों से पं० गोविन्द बल्लभ पन्त चुन लिये गये। इन चुनावों के बाद ही उ० प्र० कौंसिल के लिए चुनाव लड़े गये। इसके लिए काँग्रेस की ओर से पन्त जी ने रघुवीर सहाय को खड़ा किया। वह क्षेत्र बदायूँ बरेली दो जिलों का था और इसमें राय देने वाले लोग १०००) रु० से अधिक मालगुज़ारी देने वाले रखे गये थे। दोनों जिलों में जाकर रघुवीर सहाय ने मतदाताओं से सम्पर्क स्थापित किया। उनके विरोध में बरेली शहर के एक अंग्रेज़ी शराब कण्ट्रेक्टर श्री राधे रमन लाल अग्रवाल खड़े हुए थे। बदायूँ जिले के कार्यकर्ताओं में से एक चौधरी बदन सिंह थे जिन्होंने गुन्नौर तहसील में खुद जाकर काम करने का आश्वासन दिया था और एक पोलिंग स्टेशन पर पोलिंग एजेन्ट बनने का। वह वहाँ गये और अपना मत भी डाला पर चूँकि वह किसी दूसरे पोलिंग स्टेशन पर वोटर दर्ज थे उनका पोस्टल वोट डाला गया जो एक बन्द लिफ़ाफ़े में रखकर जिले के हेडक्वार्टर पर भेजा गया।
चौधरी बदन सिंह का वोट इनवैलिड, मतदाताओं को प्रलोभन
गिनती के समय वह चौधरी बदन सिंह का वोट इनवैलिड पाया गया। मतगणना में श्री राधे रमन लाल विजयी हुए। जब छानबीन की गई तो मालूम हुआ कि वोटर्स को ३००) रु० फ़ी वोट देने का प्रलोभन दिया गया था। वोटर्स ने अपने मत पत्रों को बैलट पेटी में न डालकर उम्मीदवार के प्रबन्धकों को जो हर पोलिंग स्टेशन पर मौजूद थे वापस कर दिये तब उनको ३००) रु० फ़ी वोट के हिसाब से दे दिया गया। बाद को एक विश्वसनीय वोटर द्वारा वह सब एकत्रित किये हुए पर्चे बैलट पेटी में डलवा दिये गये। यह प्रचलित रीति बन गई थी। अब नियम में परिवर्तन कर दिया गया है। इसी प्रकार अब एक वोटर को दो मत देने का तरीक़ा भी बन्द कर दिया गया है। अब किसी भी हालत में मतदाता अपने मत-पत्र को पोलिंग स्टेशन के बाहर नहीं ले जा सकता।
उ० प्र० कांग्रेस का निर्णय
अपने चुनाव में असफल होने के बाद रघुवीर सहाय ने उ० प्र० कांग्रेस कमेटी को लिखा तब उन्होंने इस मामले की जांच कराई। उसी के आधार पर यह निश्चय किया कि चौ० बदन सिंह ने रघुवीर सहाय को चुनाव में सहायता नहीं दी।
कांग्रेस को चुनाव में सफलता
१९३५ के गवर्नमेन्ट आफ़ इण्डिया एक्ट के आधार पर जो चुनाव लड़े गये उनमें कांग्रेस को बड़ी अधिक मात्रा में सफलता मिली। जब यह बिल के रूप में पार्लियामेन्ट के सामने पेश था। एक अवसर पर सर सैम्युअल होर, सेक्रेटरी आफ़ स्टेट फ़ार इण्डिया ने कहा था कि इस क़ानून के मातहत अगले पाँच वर्षों तक कांग्रेस किसी विधान सभा में बहुमत प्राप्त नहीं कर सकेगी। पर यह उनकी भविष्यवाणी ग़लत सिद्ध हुई। क्योंकि अधिकांश प्रान्तों में कांग्रेस मंत्री मंडलों की स्थापना हो गई। यह सब चुनाव पृथक निर्वाचन पद्धति द्वारा ही कराये गये थे। मुस्लिम लीग ने अपने उम्मीदवारों को अलहदा खड़ा कर काफ़ी मात्रा में कामयाबी प्राप्त की, पर उ० प्र० में उनकी संख्या १४ फ़ीसदी ही थी।
उ० प्र० में कांग्रेस मंत्री मंडल का आग्रह
उ० प्र० में कांग्रेस मंत्री मंडल के गठन के बाद उनका यह आग्रह हुआ कि वह उस समय तक अपना कार्य आरम्भ नहीं करेंगे जब तक गवर्नर की ओर से यह आश्वासन न दे दिया जाये कि वह अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग नहीं करेंगें। एक समय ऐसा आ गया जब यह दिखाई पड़ने लगा कि कांग्रेस मंत्री मंडल को इस्तीफ़ा देना पड़ेगा, पर गांधी जी वाइसराय की बातचीत के बाद ऐसे आश्वासन मिल जाने पर मंत्री मंडल ने कार्य-भार सम्भाल लिया।
मुस्लिम लीग का रवैय्या
मुस्लिम लीग के सदस्य यह चाहते थे कि उनको भी मंत्री मंडल में शामिल किया जाय। पर कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं हुई। मुस्लिम लीग ने क़दम-क़दम पर कांग्रेस मंत्री मंडल का विरोध किया और प्रान्त में साम्प्रदायिक वातावरण को बिगाड़ने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी।
सैयद वज़ीर हुसैन का मत
उसी समय एक अवसर पर सैयद वज़ीर हसन अवकाश प्राप्त चीफ़ जस्टिस अवध चीफ़ कोर्ट, बदायूँ आये तब उनसे एक पार्टी में रघुवीर सहाय ने दरयाफ़्त किया कि प्रान्त में साम्प्रदायिक स्थिति कैसे सुधारी जा सकती है। श्री वज़ीर हसन ने उत्तर में कहा कि जब तक मुस्लिम लीग के साथ सख़्ती का व्यवहार कांग्रेस सरकार की ओर से नहीं किया जायेगा, स्थिति में सुधार होना असम्भव है।
मुस्लिम सीट के लिए उप चुनाव तथा रघुवीर सहाय द्वारा मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को पत्र
उत्तर प्रदेश विधान सभा में खान बहादुर मौलवी फ़सीहउद्दीन के निधन पर एक मुस्लिम सीट खाली होने पर बाई इलेक्शन की घोषणा की गई। मुस्लिम लीग ने अपना उम्मीदवार श्री इक्तिदारउद्दीन हसन, बार-एट-ला सुपुत्र ख़ान बहादुर मौलवी फ़सीहउद्दीन को घोषित कर दिया। इधर कांग्रेस की ओर से भी एक मुसलमान का नाम लिया जाने लगा। जब रघुवीर सहाय को यह पता लगा कि उक्त सज्जन को कांग्रेस की ओर से खड़ा करने का विचार किया जा रहा है तो उन्होंने लखनऊ जाकर पन्त जी, रफ़ी अहमद किदवई व रन्जीत पंडित से इस सम्बंध में बात चीत की और कहा कि उक्त सज्जन को कांग्रेस की ओर से खड़ा न किया जाये, एक तो वह कामयाब नहीं हो सकेंगे, दूसरे कांग्रेस के लिए अनुपयोगी होंगे। जब रघुवीर सहाय ने यह देखा कि उनकी बात का कोई असर लखनऊ के नेताओं पर नहीं पड़ा है तो उन्होंने वहीं से एक चिट्ठी सब हालात की लिख कर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की भेजी जो उस समय कांग्रेस पार्लियामेन्टरी बोर्ड के अध्यक्ष थे और बोर्ड की मीटिंग उस समय वर्धा में हो रही थी।
कांग्रेस उम्मीदवार की नाकामयाबी
कुछ ही समय पश्चात एक दिन समाचार पत्रों में यह समाचार छपा कि पार्लियामेन्टरी बोर्ड ने बदायूँ के बाई इलेक्शन में भाग न लेने का निश्चय किया है। यह देखकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर २-४ दिन बाद दूसरा समाचार निकला कि बोर्ड ने उन्हीं मुसलमान सज्जन को खड़े करने की अनुमति दे दी है। वह कांग्रेस की तरफ से चुनाव लड़े और बुरी तरह से हारे। तब रघुवीर सहाय ने समाचार पत्रों में इस कुल काण्ड की कड़ी आलोचना की जो १४ अक्तूबर १९३६ के 'लीडर' में प्रकाशित हुई। उन्होंने कहा कि इस बाई इलेक्शन में अपना उम्मीदवार खड़ा कर कांग्रेस ने सूझ बूझ का परिचय नहीं दिया है। उन्होंने अपने विरोधियों को ऐसा मौक़ा दिया जिसमें वह उनको बुरा भला कह सकें और उनकी नीतियों पर निराधार आक्षेप कर धूल उड़ा सकें जो नहीं होना चाहिये था। यह सब चीज़ें साम्प्रदायिक वातावरण में उत्तेजना पैदा करती हैं। इस इलेक्शन में श्री इक्तिदार उद्दीन को ३७११ मत प्राप्त हुए और कांग्रेस उम्मीदवार को केवल १२३५।
मौलाना आज़ाद का मत इस सम्बंध में
बाद में जब रघुवीर सहाय की मौलाना आज़ाद से भेंट हुई तब उन्होंने बताया कि वह और पार्लियामेन्टरी बोर्ड उनकी राय से बिल्कुल सहमत थे और इस कारण पहला निश्चय किया गया। पर इसके बाद उ० प्र० मंत्री मंडल की ओर से यह धमकी दी गई कि यदि अमुक उम्मीदवार कांग्रेस की ओर से खड़ा नहीं किया गया तो सारे का सारा मन्त्री मंडल इस्तीफ़ा दे देगा। पार्लियामेन्टरी बोर्ड ऐसी विकट स्थिति उत्पन्न करने को तैयार नहीं था। इस कारण बात मान लेनी पड़ी पर यह मालूम पड़ गया कि बड़ी भूल हुई और ऐसी भूल आइन्दा कभी नहीं की जायेगी।
बदायूँ में मद्य निषेध प्रचार—डाक्टर कैलाश नाथ काटजू द्वारा
कांग्रेस मंत्री मंडल ने सबसे पहले बदायूँ जिले में मद्य निषेध करने की घोषणा की, यह जानकर यहाँ के लोगों को बड़ी ख़ुशी हुई। डाक्टर कैलाश नाथ काटजू, जो इस विभाग के इंचार्ज थे, उन्होंने स्वयं बदायूँ आकर सारे जिले को भ्रमण किया और मद्य निषेध के बारे में लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसका बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ा विशेष कर पिछड़े हुए लोगों में, जिनमें यह बुराई अधिक मात्रा में पाई जाती थी और अब भी है।
डाक्टर काटजू के बदायूँ में आगमन पर प्रदर्शन
२८ सितम्बर, १९३६ को डाक्टर कैलाश नाथ काटजू, मिनिस्टर के बदायूँ आगमन पर उनके स्वागत के लिए लोग बड़ी संख्या में रेलवे स्टेशन बदायूँ पहुँचे। कांग्रेस के वालिन्टियर्स भी तिरंगे भण्डे लिये हुए स्टेशन के बाहर उपस्थित थे। उनके रेल से उतरते ही प्लेट फ़ार्म पर कुछ विरोधियों ने प्रदर्शन किया और विरोधी नारे लगाये। जब डाक्टर काटजू प्लेट फ़ार्म से बाहर अपनी कार पर सवार होने जा रहे थे तब बाहर वाली भीड़ में जो कांग्रेस वालिन्टियर्स के पीछे खड़ी हुई थी कुछ शोर हुआ। इस पर वालिन्टियर्स ने जिनके पास लाठियाँ भी थीं, उन पर प्रहार कर लाठियों से मारा। पुलिस ने भी मारपीट में भाग लिया। कुछ एक के गम्भीर चोटें भी आईं जो बाद में अस्पताल भेज दिये गये। वालिन्टियर्स के द्वारा इस प्रकार की हिंसात्मक कार्यवाही के कारण शहर में सनसनी फैल गई और लोग कांग्रेस की आलोचना करने लगे।
रघुवीर सहाय द्वारा डा० काटजू को परामर्श
रघुवीर सहाय, कुँ० रुकुम सिंह, चौ० बदन सिंह व मौलवी इदरीस खाँ स्टेशन पर उपस्थित थे और उन्होंने यह सब हाल अपनी आंखों से देखा। रघुवीर सहाय ने डा० काटजू को यह सब हाल बताया और उनको परामर्श दिया कि सायंकाल की पब्लिक मीटिंग में भाषण देते समय इस घटना पर खेद व्यक्त कर दें इसमें कांग्रेस के वालिन्टियर्स ने अशोभनीय कार्य किया है।
मंडल कांग्रेस कमेटी द्वारा पारित प्रस्ताव
बाद को ४ अक्तूबर, १९३६ को मंडल कांग्रेस कमेटी बदायूँ की बैठक बुलाई गई और इस कुल घटना के बारे में निम्नलिखित प्रस्ताव पारित हुआ जो एक छोटे पैम्फ़लेट के रूप में छपवाकर प्रकाशित किया गया जो नीचे दिया जाता है :—
आवश्यक सूचना
२८ सितम्बर को आनरेबुल डा० काटजू साहब के आने के मौक़े पर स्टेशन बदायूँ पर जो नाख़ुशगवार बातें देखने में आईं उनके बारे में मंडल कांग्रेस कमेटी, बदायूँ ने अपनी बैठक ३ व ४ अक्तूबर में नीचे लिखा हुआ प्रस्ताव पास किया है।
प्रस्ताव
इस कमेटी की राय में बदायूँ रेलवे स्टेशन पर जो बदनुमा वाक़या आनरेबुल डा० कैलाश नाथ काटजू के आने के समय २८ सितम्बर, १९३६ को हुआ वह बहुत अफ़सोस के क़ाबिल है। यह कमेटी उन तमाम लोगों के साथ जिनको इस वाक़ये से तकलीफ़ पहुँची है हार्दिक सहानुभूति प्रकट करती है। साथ ही साथ यह कमेटी यह भी महसूस करती है कि जो सज्जन ऐसे मौक़े पर काले भण्डों का प्रदर्शन करने गये थे वह भी इस बदनुमा वाक़ये के ज़िम्मेवार हैं। फिर भी जो बरताव पुलिस व कांग्रेस के वालिन्टियर्स ने उनके साथ किया वह निन्दनीय है। पुलिस का कार्य कितना ही निन्दनीय क्यों न हो लेकिन अहिंसावादी कांग्रेस के वालिन्टियर्स को किसी प्रकार हिंसा का प्रयोग नहीं करना चाहिये था। यह कमेटी से सिफ़ारिश करती है कि प्रान्तीय कांग्रेस जल्द से जल्द एक तहक़ीक़ाती कमेटी बनाकर पुलिस व कांग्रेस वालिन्टियर्स के अनुचित कार्य की जांच कराये और जिसके बारे में जो बात साबित हो उस सम्बंध में मुनासिब कार्यवाही करे।
— रघुवीर सहाय, प्रेसीडेंट, मंडल कांग्रेस कमेटी, बदायूँ (तारीख़ ४ अक्तूबर, १९३६)
इस प्रस्ताव की नक़ल व पैम्फ़लेट की कापी उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी को भेजी गई।
कांग्रेस मंत्री मंडल ने क़ानून लगान का भी संशोधन किया जिसके फलस्वरूप केवल लगान ही कम नहीं हुआ, अथवा किसान को अपनी ज़मीन में मौरूसी हक़ भी मिल गये। ज़मींदारों ने विशेषकर मुसलमान ज़मींदारों ने इसका कड़ा विरोध किया। फैले हुए भ्रष्टाचार को कम करने के लिए उसने कई क़दम उठाये जिनके परिणाम स्वरूप अदालतों और दूसरे दफ़्तरों में भ्रष्टाचार की मात्रा बहुत कम हो गई। नशाबन्दी के बारे में तो वह पहले ही क़दम उठा चुकी थी, पर जहाँ तक मुस्लिम लीग का सम्बन्ध था, उसने मिनिस्टरों को हर तरह से बदनाम किया और आरोप लगाया कि कांग्रेस मुस्लिम हितों की किसी प्रकार रक्षा नहीं करती है। बल्कि उनके साथ और अन्याय हो रहा है। जब आगे चलकर मंत्री मंडल ने इस्तीफ़ा दे दिया तो मुस्लिम लीग ने बड़ी ख़ुशियाँ मनाईं। और "यौम निजात" मनाया गया।
सर हेरी हेग का भाषण इंगलैण्ड में
कांग्रेस मंत्री मंडल ने जब तक उ० प्र० में कार्यभार सम्भाला उस समय तक सर हेरी हेग गवर्नर पद पर रहे पर उन्होंने अपने कार्य काल में कांग्रेस सरकार के बारे में कुछ कहना उचित नहीं समझा। पर जब वह यहाँ से अपने समय की समाप्ति पर इंगलैण्ड लौट कर गये तब उन्होंने एक अवसर पर "कैक्सटन हाल" में भाषण दिया। उसमें उन्होंने उ० प्र० कांग्रेस मंत्री मंडल के कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि अल्प संख्यकों के साथ विशेषकर मुसलमानों के साथ उनका व्यवहार बहुत अच्छा, समझदारी के साथ और न्याय संगत रहा। क़ानून लगान के संशोधन के सम्बंध में भी उन्होंने बताया कि वह नितान्त आवश्यक था। समय परिवर्तन के कारण इसको नहीं रोका जा सकता था। इस भाषण की रिपोर्ट भारत में आने के पश्चात रघुवीर सहाय ने उसकी टिप्पणी करते हुए एक लेख 'लीडर' में १८ मई १९३८ के अंक में प्रकाशित कराया जिसके द्वारा जो ग़लत आरोप मुस्लिम लीग की ओर से उ० प्र० कांग्रेस मंत्री मंडल के विरुद्ध लगाये जा रहे थे उनका पूर्ण रूप से खंडन किया गया। उ० प्र० मंत्री मंडल ने जब अंग्रेज़ी सरकार के बग़ैर कांग्रेस मंत्री मंडल से परामर्श किये ही विश्व युद्ध में भाग लेने का अपना निर्णय घोषित कर दिया, तब देश भर के सभी कांग्रेस मंत्री मंडलों ने अपने-अपने स्थानों से त्याग पत्र दे दिया। इसके उपरान्त फिर से प्रान्तों में गवर्नर शासन लागू हो गया।