Chapter 6 of 11
Village Reform, Nagla Sharqi's Migration & Subhas Babu's Visit
1938–40
This book was written in Hindi in 1974 and is presented here exactly as published — it is not translated. Menus and navigation switch language; the text of the book does not.
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श्री कृष्ण दत्त पालीवाल की नियुक्ति रुरल डेवलेपमेन्ट आफ़ीसर के पद पर
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मंत्री मंडल बन जाने के पश्चात ग्राम सुधार योजना जो अधिकारियों द्वारा चलायी जा रही थी, उसको ग़ैर सरकारी हाथों में देने का निश्चय किया गया। केन्द्रीय असेम्बली सदस्य श्री कृष्ण दत्त पालीवाल ने उसका कार्य-भार संभाला और उनकी नियुक्ति उत्तर प्रदेश रुरल डेवलेपमेन्ट आफ़ीसर के पद पर की गई।
श्री एम० डी० चतुर्वेदी, आई० एफ० एस० की नियुक्ति
श्री पालीवाल ने इस पद पर नवम्बर ३७ से फरवरी १९३८ तक रह कर विभाग की नींव डाली, २७० ग्राम सुधार इकाइयों के स्थान पर इन्होंने १०५६ इकाइयाँ कायम कीं। हर एक इकाई में १२ गांव के स्थान पर २५ गांव शामिल किये गये। जिनके परिणाम स्वरूप प्रान्त के कुल गांवों में से एक चौथाई गाँवों में इस योजना को लागू कर दिया गया। जुलाई १९३८ में इस विस्तृत योजना की स्वीकृति दे दी गई। पालीवाल के फरवरी १९३८ में त्याग-पत्र देने के बाद २ मई १९३८ को श्री एम० डी० चतुर्वेदी, आई० एफ० एस० की नियुक्ति उनके स्थान पर हुई जिन्होंने १९३८-३९-४० में इसका कार्यभार संभाला और संचालन किया।
बदायूँ में ग्राम सुधार एसोसिएशन का निर्माण
लार्ड लिनलिथगो, जो बाद में भारतवर्ष के वायसराय होकर आये, जब वह एग्रीकल्चर कमीशन के अध्यक्ष पद पर नियुक्त हुए, देश के अनेक भागों में जाकर गांवों की आर्थिक, सामाजिक व कृषि सम्बंधी बातों का निरीक्षण कर अपनी रिपोर्ट में ग्राम सुधार योजना के बारे में अपने विचार प्रकट किये। उन्हीं के आधार पर १९३७ के चुनावों से पहले अंग्रेज़ी शासन की ओर से जिला कलेक्टरों द्वारा यह कार्य शुरू कर दिया गया। उस समय हर जिले में कलक्टर के अधीन एक इन्सपेक्टर व ८ या १० आरगनाइज़रों की नियुक्ति कर यह काम चालू कर दिया गया, पालीवाल ने कलक्टर के स्थान पर ग़ैर सरकारी लोगों की नियुक्ति कर, और हर जिले में ग्राम सुधार संघ (एसोसिएशन) बनाकर उसको सरकारी रूप दे दिया। जो लोग इस प्रकार नियुक्त किये गये थे वे चेयरमैन ग्राम सुधार एसोसिएशन बनाये गये। बदायूँ में इस स्थान पर रघुवीर सहाय को नियुक्त किया गया। एसोसिएशन में सरकारी व ग़ैर सरकारी दोनों प्रकार के सदस्य रखे गये। सरकारी सदस्यों में वह सब अधिकारी, जो कृषि, पशुपालन, सहकारिता, चिकित्सा, शिक्षा व वन विभाग से सम्बन्धित थे, रखे गये। ग़ैर सरकारी सदस्यों में विधान सभा के मेम्बर व अन्य लोग, जो सार्वजनिक संस्थाओं से सम्बन्धित थे या उनमें भाग लेते थे, रखे गये। बदायूँ जिले में उनकी टोटल संख्या ४२ थी। पांच सदस्यों की एक कार्यकारिणी कमेटी भी बनाई गई जिसमें चेयरमैन व सिक्रेटरी के अलावा चौधरी तुलसी राम, मिस्टर निज़ामुद्दीन हुसैन सम्पादक "ज़ुलक़रनैन" व जिला हेल्थ आफ़ीसर रखे गये।
ग्राम सुधार योजना गांधी जी के विचारों के अनुरूप
यह योजना गांधी जी के गांवों के पुनः निर्माण करने की योजना के अनुरूप होने के कारण, कांग्रेस सरकार को विशेष रुचिकर थी। इसलिए इसको काफ़ी प्राथमिकता दी गई। प्रदेश के मुख्य मंत्री श्री पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त व श्री कैलाश नाथ काटजू, जो इस विभाग के मिनिस्टर थे, स्वयं बरेली आये और डिवीजन के कमिशनर व प्रत्येक जिले के कलेक्टर, चेयरमैन ग्राम सुधार संघ व उनके सेक्रेटरीज़ व चेयरमैन डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की कानफ्रेंस कर, सम्पूर्ण ग्राम सुधार योजना पर, प्रकाश डाला गया और उसके बारे में लोगों के विचार सुने और इस प्रकार योजना के प्रति एक वातावरण तैयार कर काम चालू किया गया।
आरगनाइज़र्स की नियुक्ति
डिवीजन के प्रत्येक जिले में आरगनाइज़र्स की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यों की एक कमेटी का निर्माण कर उनकी सूची तैयार कराई गई और उसी के अनुसार जिलों को नाम भेज दिये गये। यह नियुक्तियाँ जल्दबाज़ी में की गईं। बाद में इनमें अनेक संशोधन करने की आवश्यकता हुई।
ग्राम सुधार एसोसिएशन द्वारा किये गये कार्य का ब्योरा
रघुवीर सहाय ने अपना कार्य-भार सँभाल कर, श्री जगन्नाथ त्रिपाठी, डिप्टी कलेक्टर सेक्रेटरी की सहायता व परामर्श से जिले को २४ क्षेत्रों में बांट कर आरगनाइज़र्स की नियुक्ति कर दी और सबसे प्रथम ग्रामों को साफ़ सुथरे बनाने हेतु खाद के गढ़े बनवाने का कार्य शुरू कराया। साथ ही साथ गांव के गन्दे पानी के निकास के लिए पक्की नालियाँ बनवाना व पीने के पानी के कुओं की दुरुस्ती व खरन्जे बनवाने का काम शुरू करवाया। गांव वालों की ओर से इन सब कामों के लिए तखमीने की एक तिहाई रकम देने की व्यवस्था रखी गई थी, शेष सरकार की ओर से दिया जाता था। गांव के लोग आम रास्तों पर पेशाब न करें इसके लिए पक्के पेशाब घर बनवाने की व्यवस्था की गई। निरक्षर लोगों को साक्षर बनाने के वास्ते प्रौढ़ पाठशालायें खोलने का प्रबन्ध किया गया। जिन गाँवों में पानी पीने के कुएँ नहीं थे वहाँ नये कुएँ, विशेषकर हरिजनों के वास्ते, बनवाने का भी प्रबन्ध किया गया। चिकित्सा हेतु प्रत्येक सेन्टर पर दवाई के बक्से रखवा दिये गये। बक्सों के अन्दर की दवाइयों के खत्म होने पर उनको फिर से दवाइयों से भर देने का भी इन्तज़ाम किया गया। गांव के युवकों को स्काउट ट्रेनिंग देने की व्यवस्था की गई। अच्छे क़िस्म के बीज के वितरण के लिए गोदाम खोले गये और अच्छी नस्ल के सांडों को हरियाना से मंगवाकर प्रत्येक सेन्टर पर छोड़ा गया। नये क़िस्म के हल प्रदर्शन हेतु सेन्टरों पर रख दिये गये। यह सब काम जिला ग्राम सुधार एसोसिएशन द्वारा होना निश्चित किया गया।
ग्राम सुधार कार्य में कठिनाइयाँ
पर इस सब को सुचारु रूप से काम में लाने के लिए बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सेन्टर्स अधिकतर देहातों में रखे गये थे। उनका किस प्रकार निरीक्षण हो, सेन्टर पर आरगनाइज़र्स रहते हैं अथवा नहीं, नाली खरन्जा, कुओं की मरम्मत या बिलकुल नये कुओं के बनवाने का काम शुरू किया गया या नहीं, सेन्टर से समाचार रिपोर्ट मिलती है या नहीं, गांव में सहयोग मिलता है या नहीं, इन्सपेक्टर निरीक्षण के लिए जाते हैं या नहीं, इन सब बातों को नियंत्रण में लाने के लिए लगभग एक साल का समय लग गया। इसी बीच अनेक आरगनाइज़र्स, जो काम करने में असमर्थ थे या जिनको कोई रुचि नहीं थी, अलहदा कर दिये गये। दूसरों की नियुक्ति उनके स्थान पर की गई। इन्सपेक्टरों का भी जो पहले सेट-अप में मुकर्रर किये गये थे, अनेक बार तबादले कराये गये तब कहीं जाकर काम काबू में लाया गया और स्थिरता आई।
काम में प्रगति आने लगी
जहाँ तक जिला स्तर पर कार्य के संचालन की व्यवस्था थी वह ठीक प्रकार से चलने लगी। श्री त्रिपाठी बड़े योग्य, अनुभवी और लगन से काम करने वाले सेक्रेटरी थे। वह इस कार्य के लिए काफ़ी समय देते थे। चेयरमैन को भी वह इस कार्य में पूर्ण रूप से सहयोग देते। स्वयं उनके साथ सेन्टरों पर जाकर गांवों का निरीक्षण करते। गांव वालों से बातचीत कर निर्माण कार्य को देखते। जहाँ सेक्रेटरी महोदय नहीं जाते वहाँ स्वयं चेयरमैन जाकर निरीक्षण करते थे। जिला भर में ऐसा कोई सेन्टर नहीं था जहाँ चेयरमैन स्वयं चार या पाँच बार न देखने गये हों जिसका परिणाम यह हुआ कि दूसरे साल के प्रवेश करते ही काम तेज़ी से चलने लगा। लोगों में इस काम के लिए रुचि पैदा हो गई और जिले के हेड क्वाटर्स पर नाली, खरंजा, पेशाब घर, कुआँ इत्यादि के निर्माण हेतु एक तिहाई धनराशि, जिसको गांव वालों को अदा करना अनिवार्य रखा गया था, तेज़ी से जमा होने लगी। जिसके कारण स्थान-स्थान पर निर्माण कार्य शुरू कर दिये गये।
कुओं के निर्माण कार्य चौ० तुलसी राम द्वारा
कुओं के निर्माण हेतु एक विशेष अनुदान सरकार से मिलना आरम्भ हो गया और इनकी तामीर का काम चौधरी तुलसी राम ग्राम सुधार एसोसिएशन की इन्तज़ामिया कमेटी के सदस्य ने अपनी देख रेख में ले लिया। चौ० तुलसी राम ने एक बैलों के लहड़ की व्यवस्था कर गांव-गांव, जिनमें कुओं का निर्माण कार्य आरम्भ कराये गये थे, जाना और उनको स्वयं देखना शुरू कर दिया, जिसके फलस्वरूप दूसरे व तीसरे साल के अन्त तक २२४ पक्के कुएँ, जिनमें से १० हरिजनों के लिए व ८४ दूसरे लोगों के लिए बनवाये गये। १७५ कुओं की मरम्मत कराई गई। सभी कुओं की ऐसी मनें बनवाई गईं जिससे पानी कुओं के अन्दर, बाहर से न जाने पाये, कुओं के चारों तरफ पक्के फ़र्श का निर्माण कराया गया और पानी के बहने के लिये नालियाँ बनवा दी गईं। पास में जहाँ पानी इकठ्ठा हो, वहाँ केले के पौधों को लगवा दिया गया जो पानी को सोखते हैं। वैसे तो सब ही प्रकार के निर्माण कार्य से गांव के लोग प्रभावित होते हैं पर कुओं के निर्माण कार्य से सबसे अधिक। वह कुओं के निर्माण को ही ग्राम सुधार समझने लगे और उसको सबसे अधिक महत्व देते थे।
ग्राम सुधार की त्रिवर्षीय रिपोर्ट
तीन वर्ष के अन्त पर जब रघुवीर सहाय ने अपने चेयरमैन पद से त्याग पत्र देने से पूर्व त्रिवर्षीय रिपोर्ट, प्रकाशित की और उसकी एक प्रति मिस्टर मार्श, गवर्नर के सलाहकार के पास भेजी, जो ग्राम सुधार विभाग की देख रेख करते थे, तब उन्होंने चेयरमैन को उनके प्रशंसनीय कार्य पर बधाई दी और एक भेंट में दर्शापित किया कि उन्होंने किस प्रकार इतनी बड़ी संख्या में अपने जिले में पक्के कुओं का निर्माण कराया है? उनकी जानकारी में अन्य किसी ज़िले में इतने अधिक पानी पीने के लिए कुएँ नहीं तामीर कराये गये हैं। उनको यह आश्चर्य हुआ कि प्रत्येक कुएँ की लागत में लगभग १५०) रु० खर्च में आये।
बधाई के लिए दोनों ही बराबर के हिस्सेदार
चेयरमैन ने तब उनको बताया कि यह सब कार्य प्रशन्सनीय सहयोग, जो उनको जिले में प्राप्त हुआ, उसके कारण ही सम्भव हो सका। विशेषकर चौधरी तुलसी राम के लगन से इस काम में जुट जाने के कारण। मार्श महोदय ने तब उनको बताया कि गोरखपुर जिले में केवल चार कुएँ ही बनवाये जा सके और प्रत्येक कुएँ पर १०००) रु० से भी अधिक लागत लगी।
कुओं के निर्माण के अतिरिक्त २७८६ गज पुख्ता नालियाँ बनवाई गईं। ५५ प्रौढ़ पाठशालायें खुलवाई गईं; २ पक्के घरों का निर्माण मलखानपुर व गुधनी ग्रामों में किया गया। २४३१ खाद के लिए गड्ढे खुदवाये गये। पक्के पेशाब घर ३५५ बने और कुओं से पानी भरने के लिए ७६ घिरियाँ लगवाई गईं। ७ बीज गोदाम नये क़िस्म के बीज के वितरण के लिए खोले गये। १२२ जीवन सुधार सोसाइटी रजिस्टर्ड कराई गईं। ८६ रास्तों की दुरुस्ती कराई गई। १६ नुमाइशें आयोजित की गईं। ५ पुस्तकालय क़ायम किये गये, २ औषधालय, एक एलोपैथिक डिस्पेन्सरी क़ायम की गई।
बदायूँ पधारने पर गवर्नर हेरी हेग द्वारा प्रशंसा
जब तक श्री त्रिपाठी डिप्टी कलेक्टर, सिक्रेटरी रहे ग्राम सुधार का कार्य बड़ी सहूलियत व तेज़ी से आगे बढ़ता रहा। इसी बीच प्रान्त के गवर्नर हेरी हेग के बदायूँ पधारने पर उन्होंने एक ग्राम सुधार सेन्टर किसरुआ का निरीक्षण किया, जो पक्की सड़क के किनारे बदायूँ से पाँच मील दूर पर था। पूरे गांव का भ्रमण करने के पश्चात जो तिरंगे भण्डों से सजाया गया था और जिसमें हर प्रकार की दस्तकारी व कुटीर उद्योग की वस्तुएँ प्रदर्शित की गई थीं, सफाई की दृष्टि से वह आदर्श गांव था। जब वह वापस हो रहे थे तब उन्होंने चेयरमैन को उसके लिए बधाई दी, तब रघुवीर सहाय ने कहा कि सब कार्य श्री त्रिपाठी, सिक्रेटरी के ही परिश्रम का परिणाम है। वही बधाई के पात्र हैं। तब गवर्नर महोदय बोले, "बधाई के लिए दोनों ही बराबर के हिस्सेदार हैं।"
नये कलेक्टर निकलसन का आगमन
श्री त्रिपाठी ही के कार्यकाल में नये कलेक्टर निकलसन बदायूँ आ गये और कांग्रेस मंत्री मंडल ने त्याग पत्र दे दिया। उन्होंने बदायूँ पहुँचकर तुरन्त ही श्री त्रिपाठी का तबादला करा दिया। उनकी जगह जो एक डिप्टी कलेक्टर आये, बग़ैर रघुवीर सहाय के परामर्श किये हुये उनकी नियुक्ति सिक्रेटरी के पद पर कर दी। इस पर रघुवीर सहाय ने लिखित आपत्ति की और कहा कि यह नियुक्ति बे-क़ायदा है क्योंकि उनसे इस सम्बंध में कोई परामर्श नहीं किया गया है जो अनिवार्य था। रघुवीर सहाय ने पत्र के साथ उन नियमों की प्रति भी भेज दी जो सरकार ने इस सम्बंध में बनाये थे। पर बजाय इसके कि कलेक्टर महोदय चेयरमैन के इस पत्र का उत्तर देते, उन्होंने रघुवीर सहाय को नोटिस भेज दिया कि उनको वकीलों के पैनल लायर से क्यों न अलहदा कर दिया जाय।
निकलसन द्वारा रघुवीर सहाय को नोटिस और उसका जवाब
इस नोटिस के प्राप्त होने पर रघुवीर सहाय ने कलेक्टर महोदय को लिख कर भेजा कि वह पैनल की सदस्यता से त्याग-पत्र दे देंगे। पर इससे पहले कि वह अपना त्याग-पत्र भेजें, वह चाहते हैं कि डिस्ट्रिक्ट जज से उनके कार्य के बारे में दर्याफ़त कर लिया जाय। उधर उन्होंने जिला जज को भी लिख कर प्रार्थना की कि वह अपनी व अपने सहायक जजों की राय, जिनकी अदालतों में रघुवीर सहाय ने काम किया है, कलक्टर महोदय के पास भेज दें। जज महोदय ने अपनी व अतिरिक्त जजों की सम्मति एकत्रित करके कलक्टर के पास भेज दी और इसकी सूचना रघुवीर सहाय को भी दे दी, उन सम्मतियों के प्राप्त होने के पश्चात कलेक्टर महोदय ने अपना पहला नोटिस जो रघुवीर सहाय को भेजा था, वापस ले लिया, इस कुल काण्ड में काफ़ी समय लग गया।
कलेक्टर को रघुवीर सहाय की ओर से पुनः पत्र
इसके उपरान्त रघुवीर सहाय ने कलेक्टर महोदय को पुनः याद दिलाया कि सिक्रेटरी की नियुक्ति के बारे में वह क्या कर रहे हैं। तब काफ़ी समय बाद उन्होंने अपने पत्र में स्वीकार किया कि इस नियुक्ति के करने में उनसे भूल हो गई है। उन्होंने सरकारी आदेशों को अब पढ़ लिया है और उसी के अनुसार वह चेयरमैन की राय जानना चाहते हैं कि किस डिप्टी कलेक्टर को इस पद के लिए उपयुक्त समझते हैं। इसके उत्तर में रघुवीर सहाय ने श्री केहर सिंह, डिप्टी कलेक्टर का नाम भेज दिया और लिखा कि वह एक नवयुवक हैं और इस कार्य में उनकी रुचि भी है। कलेक्टर महोदय ने इस नाम पर भी आपत्ति की और उनको न नियुक्त करने के कई कारण बतलाए और रघुवीर सहाय को एक लम्बा पत्र लिखकर जवाब माँगा कि उनका नाम उन्होंने क्यों भेजा है। समस्या बजाय सुधरने के उलझने लगी और ऐसा प्रतीत होने लगा कि कलेक्टर महोदय ग्राम सुधार के कार्यों में अड़चनें पैदा करने पर तुल गये हैं।
रघुवीर सहाय का लखनऊ में आर० डी० ओ० से परामर्श
तब रघुवीर सहाय लखनऊ गये और वहाँ रुरल डेवलपमेन्ट आफ़ीसर श्री एम० डी० चतुर्वेदी से मिले और उनको सब स्थिति से अवगत कराया। श्री चतुर्वेदी ने रघुवीर सहाय को आश्वासन दिया कि वह अपनी सम्मति श्री केहर सिंह की नियुक्ति के बारे में देंगे। यह आश्वासन प्राप्त करने पर वह बदायूँ आये। तब उनसे एक वरिष्ठ डिप्टी कलेक्टर मिलने गये, जिनको उन्होंने लखनऊ की सारी वार्ता का हाल बताया। उक्त डिप्टी कलेक्टर ने तुरन्त कलेक्टर को यह सब बात सुना दी, जिसका परिणाम यह हुआ कि कलेक्टर महोदय ने श्री केहर सिंह की नियुक्ति सेक्रेटरी पद पर कर दी और इसकी सूचना रघुवीर सहाय को भी दे दी। पर इस कुल वाद विवाद से यह साफ़ ज़ाहिर हो गया कि कलेक्टर महोदय ग्राम सुधार के काम में बाधक सिद्ध होंगे।
श्री केहर सिंह सेक्रेटरी पद पर
श्री केहर सिंह ने तुरन्त कार्य भार सँभाल लिया। वह चेयरमैन के इस्तीफ़ा देने के समय तक बराबर अपने पद पर रहे। उनका भी सहयोग सराहनीय रहा और त्रिपाठी जी की भांति वह भी चेयरमैन के साथ सेन्टरों पर जाकर ग्राम सुधार के काम का निरीक्षण करते ओर पूरी दिलचस्पी से काम करते रहे।
आदर्श गांव निर्माण का कार्य, मलखानपुर की प्रगति
इधर समस्त सेन्टरों पर साधारण कार्यों के चालू हो जाने पर अब ध्यान आदर्श गांव बनाने की ओर आकर्षित हुआ। रघुवीर सहाय ने सिक्रेटरी से परामर्श करने के पश्चात मलखानपुर (तहसील बिसौली) परसिद्धपुर (तहसील दातागंज) सिकन्दराबाद (तहसील बदायूँ) इसके लिए चुने और इन सेन्टरों पर योग्य-से-योग्य आरगनाइज़र्स की नियुक्ति कर दी गई। इन सेन्टरों व ग्रामों को समय समय पर चेयरमैन व सिक्रेटरी स्वयं जाकर देखते और आवश्यक सुझाव देते। इन सभी गांवों में मलखानपुर की प्रगति आदर्श गांव की ओर तेज़ी से होने लगी। गांव के सभी मकान लिप-पुत गये। उनके कोठे व कोठरियों में रोशनदान लग गये। रास्ते सब साफ़ रहने लगे। पेशाब करने के वास्ते पक्के पेशाब घर बना दिये गये। कोई ग्रामवासी रास्ते में पेशाब नहीं करता था। मकानों के सामने पूरे कूड़े डालने बन्द हो गये। घूरे कूड़े के लिए खाद के गड्ढों का निर्माण कर दिया गया। गांव में चिकित्सा हेतु एक औषधालय क़ायम कर दिया गया। गांव के समस्त कुओं की मरम्मत करा दी गई और उनकी आदर्श मनें बनवा दी गईं। पानी निकालने के लिए पक्की नालियों का निर्माण किया गया। कुओं के पास केले के पेड़ लगवाये गये जो मैले पानी को सोख लेते थे। गांव में झगड़े फ़साद बिलकुल बन्द हो गये। यदि कोई हो भी जाता तो जीवन सुधार सोसाइटी द्वारा उसको तै करा दिया जाता। गांव के सब लोग जमींदार का लगान समय पर अदा कर देते। पक्के पंचायत घर का निर्माण कराया गया जिसके लिए गाँव वालों ने एक तिहाई धन जमा किया। इस कुल इमारत की लागत ८००) रु० आई। इस गांव के पंचायत घर की नींव डा० कैलाश नाथ काटजू, जो इस विभाग के मंत्री थे, उन्होंने डाली। श्री सैय्यद अब्दुल हकीम, डिप्टी स्पीकर, उत्तर प्रदेश विधान सभा, आचार्य श्री जुगुल किशोर व श्री ए० जी० बेर, पार्लियामेन्ट्री सेक्रेटरीज़ ने भी गांव को देखकर प्रशंसा की।
कलेक्टर निकलसन का असन्तोष व झूठी रिपोर्ट
पर जब श्री निकलसन कलेक्टर इस गांव को देखने गये तो वह अप्रसन्न हुए। गांव की उन्नति ने उन्हें प्रभावित नहीं किया। पड़ोस के गांव संग्रामपुर के जमींदारों के कहने-सुनने के कारण उन्होंने ग़लत धारणा बना ली और रुष्ट होकर अपने कैम्प से ही एक निरीक्षण पत्र लिखकर रुरल डेवलपमेन्ट आफ़ीसर, लखनऊ को भेज दिया जिसमें उन्होंने लिखा कि इस ग्राम में किसी प्रकार की उन्नति नहीं हुई है। रुपये पैसे का दुरुपयोग किया गया है। रघुवीर सहाय के पास इस नोट की कोई प्रतिलिपि नहीं भेजी पर इसकी सूचना जब उनको मिली तब वह स्वयं रुरल डेवलपमेन्ट आफ़ीसर से लखनऊ जाकर मिले और उनको सब स्थिति से अवगत कराया तब आर० डी० ओ० ने उन्हें बताया कि वह स्वयं कलेक्टर महोदय से सन्तुष्ट नहीं हैं और अपने अनुभव के आधार पर कह सकते हैं कि कलेक्टर महोदय की ग्राम सुधार में कोई रुचि नहीं है। लखनऊ से वापस आने पर रघुवीर सहाय को बताया गया कि उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से डिवीजन भर के गांवों में सबसे श्रेष्ठ मलखानपुर को हैग शोल्ड प्रदान की गई है। वह गांव केवल चेयरमैन, सेक्रेटरी की ही निगाह में सबसे श्रेष्ठ नहीं था वरन् उसको उत्तर प्रदेश सरकार ने भी यह स्थान दिया।
ग्राम सुधार नुमायश, मेला ककोड़ा पर नुमायश, बहुत अच्छा जलसा बरखास्त
ग्राम सुधार से सम्बंधित लोगों को यह जानकर हर्ष हुआ। आगे चलकर मेला ककोड़ा पर गंगा किनारे जब हर साल के मुताबिक कार्तिक के स्नान के अवसर पर वहाँ ग्राम सुधार नुमायश का आयोजन किया गया तब नुमायश के समापन के समय कलेक्टर महोदय को ही इनाम वितरण के लिए आमंत्रित किया गया। वहाँ 'हैग शील्ड' एक कपड़े से ढककर उस स्थान के पीछे रखवा दी गई थी जहाँ कलेक्टर महोदय को आसन दिया गया था। सभा को सम्बोधित करते हुए रघुवीर सहाय ने अपने भाषण में पिछले वर्षों की प्रगति की ओर जनता का ध्यान आकर्षित किया व अपनी कठिनाइयों का भी वर्णन किया। इस सम्बंध में उन्होंने बताया कि कलेक्टर की ओर से कैसी कैसी बाधायें उनके काम में डाली गईं। सहायता बिलकुल प्राप्त नहीं हुई। मिसाल के तौर पर उन्होंने बताया कि जिस मलखानपुर गांव को आदर्श बनाने में विभाग की ओर से कोई कसर न उठा रखी गई और जिसको गवर्नर महोदय की सर्वश्रेष्ठ गांव होने के नाते शील्ड प्राप्त हुई है उसके बारे में कलेक्टर महोदय ने बड़ी अनुचित बातें लिखकर ऊपर को भेजी हैं। जब वह यह कह रहे थे तभी वह कपड़े में ढकी हुई शील्ड खोलकर उपस्थित जनता के सामने पेश की गई, जिसपर हर्ष ध्वनि हुई और तालियाँ बजाई गईं। यह सब कलेक्टर महोदय की उपस्थिति में हुआ। अन्त में रघुवीर सहाय ने कहा कि अब कलेक्टर महोदय अपना भाषण देंगे और इनाम वितरण करेंगे। कलेक्टर महोदय इतना घबरा गये कि जब वह खड़े हुये तो उनके पैर कांप रहे थे। उनकी ज़ुबान से शब्द नहीं निकल रहे थे, केवल उन्होने इतना कहा—"नुमायश बहुत अच्छा, जलसा बरखास्त"
एक ही बिरादरी के लोग गांव में आबाद
मलखानपुर गांव को आदर्श बनाने के निश्चय से पहले इस बात का भी ध्यान रखा गया कि इस गांव में केवल एक बिरादरी के ही लोग आबाद हैं जिनसे ग्राम सुधार के काम में सहायता मिलेगी। अनुभव से यह अनुमान सही निकला। इस गांव के प्रमुख व्यक्ति श्री वेद राम ने सराहनीय सहयोग दिया और गांव को आदर्श बनाने में श्री प्यारे लाल भंडारी आरगनाइज़र का विशेष योगदान रहा। ग्राम सुधार के समस्त गांवों में नशाबन्दी का प्रचार किया गया और इसके कहने में अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इन सभी गांवों में नशे का इस्तेमाल क़रीब क़रीब बन्द हो गया।
जिले के अन्य आदर्श गांव
मलखानपुर के अतिरिक्त आदर्श गांव बनाने हेतु परसिद्धपुर (तहसील दातागंज) में भी प्रयत्न किये गये। वहाँ बाबू लखपत राय ने गांव के निर्माण कार्यों में विशेष दिलचस्पी दिखाई और सहयोग दिया। इनकी दिलचस्पी के कारण गांव में पक्की नालियाँ, खरन्जे, कुओं के मन इत्यादि की दुरुस्ती कराई गई उनके गांव में स्काउटिंग के भी प्रदर्शन कराये गये। बाबू लखपत राय ने बाद को अपनी निजी भूमि में से एक बड़ी मात्रा में, श्री विनोबा भावे के बदायूँ आने पर, दान कर दी। मलखानपुर, परसिद्धपुर के अतिरिक्त सिकन्दराबाद (तहसील बदायूँ) में श्री केशव लाल की सहायता से पंचायत घर के निर्माण का कार्य शुरू करा दिया गया जो बाद को पूरा हो गया। इस स्थान पर धर्मदास आरगनाइज़र ने बड़ी रुचि से कार्य किया।
एलोपैथिक डिस्पेन्सरी की स्थापना
ग्राम सुधार का काम धीरे धीरे जड़ पकड़ता गया और गांव वालों में इसके लिए श्रद्धा उत्पन्न होने लगी। वह स्वेच्छा से आर्थिक सहायता देने लगे और श्रमदान भी देते थे। औषधालयों के खुल जाने से चिकित्सा की सुविधा गांव में मिलने लगी। एक एलोपैथिक डिस्पेन्सरी जिले में खोले जाने के सम्बंध में विशेष कठिनाई उत्पन्न हुई। रघुवीर सहाय चेयरमैन इस मत के थे कि यह डिस्पेन्सरी जिले के ऐसे स्थान पर खोली जाय जहाँ की जनता को किसी प्रकार की चिकित्सा सम्बंधी सहूलियतें उपलब्ध न रही हों और इसी कारण उन्होंने ग्राम मोअज़्ज़मपुर, जो बदायूँ जिले की पूर्वी हद पर शाहजहाँपुर जिले से लगा हुआ है, इसके लिए चुना। पर उस समय के सिविल सर्जन इस गांव में अस्पताल खोलने के विरुद्ध थे। वह चाहते थे कि डिस्पेन्सरी ऐसे स्थान पर खोली जाय जहाँ उनकी कार आसानी से आ जा सके। पर अन्त में डिस्पेन्सरी मोअज़्ज़मपुर में ही रखी गई। इसके लिए गांव के उत्साही ज़मींदार लाला बाबूराम ने अपने रहने का मकान और उसके सामने का बहुत बड़ा खुला हुआ मैदान दे दिया। जब डिस्पेन्सरी चालू हो गई और उसमें सब सामान आ गया तो एक डाक्टर भटनागर की नियुक्ति की गई जिन्होंने डिस्पेन्सरी का संचालन बड़ी ही लगन, सहानुभूति के साथ किया। उसकी ख्याति दूर दूर तक फैल गई और लोग इलाज के लिए अस्पताल आने लगे। जब नये सिविल सर्जन डाक्टर गोयल ने उसका निरीक्षण किया तब वह अत्यन्त प्रसन्न हुये और कहने लगे कि जिले के अस्पतालों में वह सबसे श्रेष्ठ अस्पताल है। इसने कई वर्ष लगातार उस क्षेत्र में उपयोगी कार्य किया और वहाँ की जनता को लाभ पहुँचाया। पर जब चेयरमैन रघुवीर सहाय ने इस्तीफ़ा दे दिया और उसका कार्यभार कलेक्टर ने सँभाला तब उन्होने अपने आदेश द्वारा डिस्पेन्सरी को मोअज़्ज़मपुर से हटाकर कछला भेज दिया। कछला बड़ी गंगा के किनारे एक गांव है। उस क्षेत्र के लोगों को पहले से उभानी व बदायूँ, जो दोनों स्थान पक्की सड़क पर स्थित हैं वहाँ के अस्पतालों की सुविधायें उपलब्ध थीं।
प्रशंसनीय योगदान ग्राम सुधार के कार्य में
जिले में ग्राम सुधार योजना को सफल बनाने हेतु श्री स्वामी श्यामानन्द, श्री चौधरी तुलसी राम, पंडित निरन्जन लाल व बाबू लखपत राय से प्रशंसनीय सहयोग मिलता रहा।
चेयरमैन पद से त्याग-पत्र
रघुवीर सहाय ने चेयरमैन पद से जब त्याग पत्र दिया तो उस समय लगभग आधे से ज्यादा आरगनाइज़र्स ने त्याग-पत्र दे दिये। इस्तीफ़ा देने से पहले जो हज़ारों रुपये की धनराशि गांव वालों ने अपने एक तिहाई हिस्से की गांव में निर्माण कार्य हेतु जमा कर रखी थी, उस सब रकम को उन्होंने वापस लौटा दिया और उन लोगों से कहा कि यह धन वह जब दाखिल करें जब नये चेयरमेन की नियुक्ति कर दी जाये। वह दिन फिर कभी लौट कर नहीं आया और न ये निर्माण कार्य ही हो सके।
ग्राम सुधार योजना पंचायत राज में परिवर्तित
ग्राम सुधार योजना गांधी जी के विचारों के अनुरूप होने के कारण कांग्रेस मंत्री मंडल को अधिक रुचिकर थी और इसी कारण उसको सफल बनाने के विशेष प्रयत्न किये गये। इस योजना को कार्य रूप में लाने के फलस्वरूप एक नया जीवन गांव में दिखाई देने लगा। गांव वाले अपने विकास कार्यों में रुचि लेते और पूरी-पूरी सहायता देते। इस काम को स्वतंत्रता मिलने के बाद सामुदायिक विकास योजना का रूप दे दिया गया, जिसने सारे देश में फैलकर पंचायती राज का स्थान ग्रहण किया। अब उसी के फलस्वरूप गांवों में चुनी हुई पंचायतें, क्षेत्रीय समितियाँ व जिला परिषद स्थापित कर दिये गये हैं।
निकलसन कलेक्टर की नीतियाँ
कलेक्टर निकलसन ने केवल ग्राम सुधार के कार्यों में ही बाधायें डालने का प्रयत्न नहीं किया वरन् उन्होंने अपनी नीतियों से साम्प्रदायिक भावनाओं को उत्तेजित करने में भी कोई कसर न उठा रखी।
मोहर्रम के अवसर पर नगला शरक़ी से संबंधित जारी किये गये आदेश
द्वितीय विश्वयुद्ध के आरम्भ होते ही, अंग्रेज़ी सरकार ने यह घोषणा कर दी कि भारतवर्ष भी ब्रिटेन के साथ युद्ध में शामिल हो गया है। इस घोषणा से पूर्व सरकार ने न तो देश में किसी व्यक्ति से और न कांग्रेस मंत्री मंडल से, जो देश के विभिन्न प्रान्तों में शासन कर रहे थे कोई परामर्श किया। जिसके परिणाम-स्वरूप कांग्रेस मंत्री मंडलों ने त्याग-पत्र दे दिये और समूचे देश में तानाशाही का राज चल पड़ा। नौकर शाही अपने असली रूप में सामने आ गई थी। ऐसे समय में निकलसन ने मुहर्रम के अवसर पर नगला शरक़ी, जो शहर के समीप रेलवे लाइन के पास एक गांव है, जिसमें लगभग १५००० कुर्मियों की बस्ती में ३० या ४० मुसलमान आबाद हैं एक नयी प्रथा बग़ैर गांव वालों से पूछे हुये या उनकी सम्मति प्राप्त किये कायम करने के सम्बंध में आदेश जारी कर दिये।
पूर्व सालों में जो आदेश दिये गये
इसमे पूर्व श्री फ़य्याज अली, हाकिम परगना बदायूँ ने १९३८ में मुसलमानों को मेंहदियों से बग़ैर रोशनी के निकालने के आदेश दिये। अगले वर्ष १९३९ में मुहम्मद अस्करी, हाकिम परगना बदायूँ ने भी वैसे ही आदेश जारी किये कि वह लोग गांव से मेंहदी निकालने के समय कोई रोशनी नहीं करेंगे। जब गांव से निकलकर वह शहर में दाखिल हों तो रोशनी कर सकते हैं। पर जब १९४० में निकलसन ने कार्य-भार संभाला, तब उन्होंने इन आदेशों के विपरीत नये आदेश अपने हुक्म से जारी कर दिये, वह इस प्रकार थे:—"गांव के मुसलमान रोशनी के साथ मिट्टी मेंहदी गांव में होकर ले जा सकते हैं, और लंगर की गाड़ियों के साथ नीचे को भुकाये अलम ले जा सकते हैं" यह बिलकुल नयी प्रथायें थीं जिसके कारण गांव के लोगों में भारी असन्तोष फैल गया। निकलसन ने इन आदेशों के पालन हेतु बरेली से फ़ौज व हथियार बन्द पुलिस बुलाकर गांव के चारों ओर तैनात कर दी जिसके कारण और आतंक छा गया।
गांव वालों का निश्चय, गांव को छोड़कर दूसरी जगह बसा जाय
ऐसे समय पर कुंवर रुकुम सिंह ने, जो उसी गांव के रहने वाले थे और जिनका गांव के लोगों पर काफ़ी प्रभाव था, ग्राम में मारकाट को रोकने के अभिप्राय से यह निश्चय किया कि समस्त गांव के रहने वाले गांव को छोड़कर गांव के पूरब २ मील जाकर जंगल में बस जायें। उनके कहने के अनुसार सारे गांव-वासी गांव खाली कर जंगल में जाकर बस गये। इस घटना की ख़बर बाहर फैलने लगी जब सम्पादक 'हिन्दुस्तान टाइम्स' श्री देव दास गांधी को मालूम हुआ तब उन्होंने एक पत्र लिखकर रघुवीर सहाय को आग्रह किया कि वह उस उजड़े हुये गांव के बारे में विस्तार के साथ जानकारी एकत्रित कर तुरन्त उनके पास भेजें। इस पत्र के मिलने पर रघुवीर सहाय नये बसे हुये गांव में पहुँचे। वहाँ कुंवर रुकुम सिंह व मुंशी एकराम सिंह से बात-चीत की। मुंशी एकराम सिंह ने तारीख़ वार सब घटनाओं का उनसे उल्लेख किया और उन आदेशों को भी उन्हें दिखाया जो समय-समय पर अधिकारियों द्वारा जारी किये गये थे। वह नवीन आदेश निकलसन ने, हाकिम परगना बदायूँ, अब्दुल रऊफ़ के दस्तख़तों से न जारी कराके स्वयं अपने दस्तख़तों से जारी किये।
नया बसा हुआ गांव
नये बसे हुये गांव में रघुवीर सहाय ने देखा कि एक लम्बे-चौड़े क्षेत्र में बाग़ के पेड़ों के नीचे सारा नगला गांव बसा हुआ था। उनके राउटी, छप्पर, चक्की चूल्हे, हल, बैल, मवेशी अकरी इत्यादि सब ही वहाँ मौजूद थे और हँसी-ख़ुशी से अपना जीवन निर्वाह कर रहे थे। वहाँ से लौटने पर उन्होंने एक विस्तृत रिपोर्ट श्री देवदास गांधी को देहली रवाना कर दी। वह रिपोर्ट ३ मार्च, १९४० को भेजी गई थी जो 'हिन्दुस्तान टाइम्स' के ५ मार्च, १९४० के अंक में प्रकाशित हुई, समाचार का शीर्षक इस प्रकार था :—
'नगला शरक़ी के लोगों की हिजरत'
'झगड़े वाले मामले का इतिहास'
'डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की ओर से नई प्रथाओं के बारे में आदेश'
नगला शरक़ी की हिजरत की घटना का प्रकाशन
'हिन्दुस्तान टाइम्स' के सम्पादक ने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को भी इस सम्बंध में लिखकर उनसे भी जानकारी प्राप्त कर ली। फिर दोनों जानकारियों को उन्होंने पेपर में छापकर अपनी टिप्पणी भी दी, जिसमें उन्होंने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को नई प्रथाओं को बग़ैर गांव के बसने वालों की सम्मति प्राप्त किये हुये जारी करने का दोषी ठहराया और नगला शरक़ी के लोगों को हिजरत करने पर मजबूर करने का ज़िम्मेदार करार दिया। उन समाचारों व टिप्पणियों के प्रकाशन से समस्त प्रान्त के लोगों का ध्यान इस आश्चर्य जनक घटना की ओर आकर्षित हुआ। यह अपने प्रकार की एक निराली घटना थी।
डाक्टर मुंजे बदायूँ में
डाक्टर मुंजे भी इस घटना की ख़बर पाकर बदायूँ आये और स्वयं वह नये बसे हुये गांव को देखने गये। वहाँ से पूछताछ करने के पश्चात जब वह लौट रहे थे तब उनको किसी व्यक्ति ने 'हिन्दुस्तान टाइम्स' की वह प्रति दी, जिस में इस काण्ड का सारा वर्णन प्रकाशित हुआ था। अगले दिन उन्होंने उत्तर प्रदेश के गवर्नर से बरेली के सरकिट हाऊस में भेंट की और उनको नगला शरक़ी के कुल काण्ड से अवगत कराया और उनको 'हिन्दुस्तान टाइम्स' की वह प्रति भी दी जिसमें यह सब हाल प्रकाशित हुआ था। गवर्नर महोदय उन सब बातों से प्रभावित हुये। उन्होंने डाक्टर मुंजे को आश्वासन दिया कि उन सब पर सहानुभूति से विचार करेंगें। उसका परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय के बाद निकलसन ने अपने आदेशों को वापस ले लिया और नये स्थान पर बसे हुये लोगों को अपने गांव में वापस आ जाने के लिए आग्रह किया। फलस्वरूप वे सब फिर गांव में वापस आ गये। हिन्दू-मुसलमान दोनों ही वहाँ अमन चैन से बस रहे हैं और हँसी ख़ुशी से अपने त्योहार मनाते हैं। निकलसन ने एक अनोखी बात कर वातावरण को दूषित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी।
सुभाष बाबू का बदायूँ में आगमन
५ मार्च, १९४० को सुभाष बाबू बदायूँ पधारे। उनको लाने के लिए श्री सियाराम व श्री धर्मपाल विद्यालंकार कासगंज गये। जहाँ से उन्हें आगरा-काठ गोदाम एक्सप्रेस से बदायूँ लाये और उनका भाषण दयानन्द सेवाश्रम में एक विशाल जन-समूह की उपस्थिति में हुआ। सुभाष बाबू ने त्रिपुरी कांग्रेस के बाद से कांग्रेस से पृथक होकर एक नई पार्टी 'फ़ारवर्ड ब्लाक' के नाम से स्थापित की और स्थान-स्थान पर जाकर उसके लिए प्रचार किया। उनके भाषण को जनता ने बड़े ध्यान से सुना। उनके गले में एक पतली सी जंजीर में एक छोटा सा माइक्रोफ़ोन लटक रहा था जिसके सहारे वह सभाओं को सम्बोधित करते थे। सुभाष बाबू जिस दिन बदायूँ पधारे उसी दिन डाक्टर मुंजे भी नये बसे हुए गांव देखने गये और उसी दिन थोड़े से समय के लिए उत्तर प्रदेश के गवर्नर भी बदायूँ आये जो बाद को बरेली वापस चले गये। जहाँ अगले दिन डाक्टर मुंजे ने उनसे भेंट की।