Chapter 7 of 11
Individual Satyagraha & the Quit India Movement
1940–44
This book was written in Hindi in 1974 and is presented here exactly as published — it is not translated. Menus and navigation switch language; the text of the book does not.
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सरकार की ओर से विश्वयुद्ध में शामिल होने के पश्चात कांग्रेस कार्य-कारिणी की प्रतिक्रिया
यूरोप में दूसरे विश्व युद्ध के आरम्भ होने पर भारतवर्ष के वायसराय ने भी ब्रिटेन के साथ जर्मनी के खिलाफ़ युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी। इस घोषणा के पहले न तो वायसराय ने देश के लोगों की राय जानने का कोई प्रयत्न किया न जो कांग्रेस मंत्री मंडल, जो प्रान्तों में सरकारें बनाये हुये थे, उनसे कोई परामर्श किया। ऐसी अवस्था में १४ सितम्बर, १९३९ को कांग्रेस कार्यकारिणी समिति ने वर्धा में गांधी जी की उपस्थिति में एक प्रस्ताव पास कर अपना मत प्रकट किया कि यद्यपि स्वतंत्र भारत अपनी खुशी से अन्य स्वतंत्र देशों के साथ, धांधली से दूसरे देशों पर हमला करने वालों के विरोध में अपना सहयोग देगा, पर वह ब्रिटिश सरकार से यह जानने का इच्छुक है कि लड़ाई के सम्बंध में उसके क्या उद्देश्य हैं और प्रजातन्त्र के बारे में क्या धारणायें हैं विशेषकर इनका प्रयोग किस प्रकार से भारतवर्ष के साथ युद्ध के दौरान और फिर उसके बाद किया जायेगा।
गांधी जी की वायसराय से भेंट
इस प्रस्ताव के परिणाम-स्वरूप गांधी जी वायसराय से मिले और उसकी परिभाषा की। वायसराय ने उत्तर में न तो लड़ाई के उद्देश्यों पर ही प्रकाश डाला न देश को कब तक स्वतंत्रता प्राप्त हो सकेगी इस सम्बंध में ही कोई आशाजनक बात बताई।
कांग्रेस मंत्री मंडलों के त्याग-पत्र
कांग्रेस कार्यकारिणी ने पुन: इस स्थिति पर विचार करने के पश्चात निश्चय किया कि मौजूदा युद्ध के सम्बंध में कांग्रेस कोई सहायता नहीं देगी। साथ ही साथ यह भी निश्चय किया गया कि सभी प्रान्तीय कांग्रेस मंत्री मंडल अपने-अपने स्थानों से त्याग-पत्र दे दें। फलस्वरूप उत्तर प्रदेश कांग्रेस मंत्री मंडल ने भी इस्तीफ़ा दे दिया और शासन गवर्नर के हाथों में आ गया।
रामगढ़ का कांग्रेस अधिवेशन, व्यक्तिगत—सत्याग्रह आन्दोलन
इसके पश्चात मार्च, १९४० को रामगढ़ (बिहार) के कांग्रेस अधिवेशन में, जिसमें भाग लेने बदायूँ से रघुवीर सहाय भी गये, यह प्रस्ताव पास हुआ कि ऐसी अवस्था में कांग्रेस के पास सिविल नाफ़रमानी आन्दोलन को जारी करने के सिवाय कोई दूसरा उपाय नहीं है, जो गांधी जी के नेतृत्व में आरम्भ किया जायगा। तदनुसार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बम्बई अधिवेशन में १५ सितम्बर, १९४० को व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन गांधी जी के संचालन में आरम्भ करने का प्रस्ताव पास किया गया और सबसे प्रथम सत्याग्रही श्री विनोबा भावे को इसके लिए मनोनीत कर गांधी जी ने इस आन्दोलन को १७ अक्टूबर १९४० को प्रारम्भ कर दिया। प्रदेश कांग्रेस कमेटियाँ सत्याग्रह करने वालों के नामों की सूची उनके पास भेज देती थीं। तब गांधी जी अपनी स्वीकृति देकर उन नामों को वापस करते थे और उसी सूची के अनुसार सत्याग्रह करने वाले अपना काम शुरू कर देते।
मुअज़्ज़मपुर गांव में सत्याग्रह का आरम्भ
रघुवीर सहाय को सत्याग्रह करने के आदेश ऊपर से प्राप्त हो गये थे। वह ग्राम सुधार के चेयरमैन पद से पहले ही त्याग-पत्र दे चुके थे। उन्होंने तुरन्त कलेक्टर जिला के नाम पत्र लिखकर उनको सूचित किया कि वह ७ फरवरी, १९४१ को ग्राम मुअज़्ज़मपुर, जो बदायूँ से लगभग २० मील दूरी पर है, २ बजे सत्याग्रह करेंगें। वह गांव में ६ फरवरी की शाम को ही एक बैलगाड़ी द्वारा सफ़र करके पहुँच गये। वहाँ लाला बाबूराम के मकान पर ठहरे। पर उसहत की पुलिस ने उनको उसी समय गिरफ़्तार कर रात को पुलिस स्टेशन पर रखा। दूसरे दिन वह बदायूँ जेल पहुँचा दिये गये, जहाँ उनके खिलाफ़ धारा ३८/१२१ डी० आई० आर० (४०-४१) के आधीन मुकदमा चलाकर ८ माह की कैद सख्त व २००) रुपये जुर्माने की सज़ा दे दी गई।
गिरफ़्तारियाँ व सज़ायें
इसी प्रकार जिले के विधान सभा सदस्य चौधरी बदन सिंह व कुँवर रुकुम सिंह ने भी आदेश प्राप्त होने पर कलेक्टर को पत्र भेजे। वह भी गिरफ़्तार कर जेल भेज दिये गये। तदोपरान्त चौधरी तुलसीराम, मास्टर जंग बहादुर, हरशरण वर्मा, स्वामी श्यामानन्द, पंडित निरन्जन लाल गंडहा गिरफ़्तार कर जेल भेज दिये गये। सभी पर मुकदमे चलाकर सज़ायें दे दी गईं। पंडित निरन्जन लाल गंडहा, जो एक प्रतिष्ठित ज़मींदार थे, उनको ६ मास की कड़ी सज़ा व ५००) रु० जुर्माने के डाले गये। जिले में यह जुर्माने की सबसे अधिक राशि थी जो तुरन्त वसूल कर ली गई।
केवल पत्र भेजने वालों को ही गिरफ़्तार न कर अनेक कांग्रेस से संबंधित व्यक्तियों को भी डी० आई० आर० में जेल भेज दिया गया और डी० आई० आर० की धाराओं के आधीन मुकदमे चलाकर सज़ायें कर दी गईं। शीघ्र ही बदायूँ जेल राजनैतिक बन्दियों से भर गई।
महावीर त्यागी, आचार्य जुगल किशोर आदि बदायूँ जेल में
उस समय महावीर त्यागी, आचार्य जुगुल किशोर व श्री खुर्शैद लाल भी अन्य जेलों से बदायूँ जेल पहुँच गये। पहाड़ी क्षेत्र के भी अनेक राजनैतिक बन्दी वहाँ आ गये। उनमें से एक देवीदत्त कांडमाल थे।
निकलसन कलेक्टर द्वारा जेल का निरीक्षण और त्यागी जी का बी क्लास से सी में कर दिया जाना
बदायूँ जेल की एक छोटी सी बैरक में, जो दीवानी बैरक के नाम से पुकारी जाती थी, श्री महावीर त्यागी, आचार्य जुगल किशोर व रघुवीर सहाय रखे गये थे। यह बैरक अन्य बैरकों से अलग थी और इनको दूसरी बैरकों के राजनैतिक बन्दियों से मिलने नहीं दिया जाता था। एक दिन निकलसन कलेक्टर, जो जेल के निरीक्षण को आये थे, सिविल बैरक में आकर पूछने लगे कि वह लोग कोई मशक्कत करते हैं। सत्याग्रहियों के जवाब से सन्तुष्ट न होकर वह मुँह बिगाड़ कर बोले कि यह 'होटल' नहीं है यह जेलख़ाना है। यहाँ मशक्कत अनिवार्य है। इस पर श्री त्यागी ने आपत्ति की और कहा कि निकलसन ने अनुचित शब्दों का प्रयोग किया है। इस जवाब से अप्रसन्न हो वह वहाँ से चले गये और दफ़्तर में जाकर नोट लिख दिया कि श्री त्यागी को बी क्लास न देकर सी क्लास में कर दिया जाये। तदोपरान्त गर्वनमेन्ट की स्वीकृति प्राप्त होते ही त्यागी जी सी क्लास में रख दिये गये, पर बदायूँ जेल में ही रहे।
रघुवीर सहाय को फ़तेहगढ़ सेन्ट्रल जेल भेज देना
इस घटना के बाद रघुवीर सहाय को फ़तेहगढ़ सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया जहाँ से वह अपनी पूरी सज़ा काट कर १९ सितम्बर, १९४१ को बदायूँ वापस आये। इसी बीच में उनके पिता श्री बाबू गंगा सहाय की मृत्यु हो गई।
बदायूँ जेल में सी क्लास बन्दियों का असन्तोष
बदायूँ जेल में उस समय जिले के सत्याग्रहियों के अतिरिक्त अन्य जिलों से भी काफ़ी संख्या में बन्दी भेज दिये गये थे, जो अधिकांश सी क्लास में ही रखे गये थे। उनके खाने-पीने की व्यवस्था, चिकित्सा सम्बंधी प्रबन्ध इस प्रकार के थे जिनके कारण सत्याग्रहियों में घोर असन्तोष फैल गया। भूख हड़ताल आरम्भ कर दी गई। प्रमुख हड़ताल करने वाले देवी दत्त कांडपाल थे। इनकी भूख हड़ताल काफ़ी लम्बी चली। भूख हड़ताल के समाचार पत्रों में प्रकाशित होने पर महादेव भाई, गांधी जी के निजी सचिव व श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित ने समय-समय पर रघुवीर सहाय को पत्र लिख आवश्यक जानकारी प्राप्त की और रघुवीर सहाय को लिखा कि वह काण्डपाल से मिलकर भूख हड़ताल समाप्त करने के लिए उन्हें परामर्श दें।
धारा ५२ प्रिज़नर्स ऐक्ट के मुकदमे
इधर जेल में भूख हड़ताल करने वालों के विरुद्ध धारा ५२ प्रिज़नर्स ऐक्ट के आधीन मुकदमे चलाकर उनको लम्बी-लम्बी सज़ायें दी जाने लगीं। काण्डपाल के खिलाफ़ मुकदमे में उस समय के जेल सुपरिन्टेन्डेन्ट ने बयान में यह बात मानी कि बन्दियों के खाने के साग में उनको एक मरा हुआ बिच्छू दिखाया गया था। सत्याग्रहियों की ओर से जवाब देही में यही कहा गया था कि खाने की वस्तुओं को पवित्रता व शुद्धता के ख़याल से नहीं पकाया जाता था, इसी कारण उनको लेना बन्द कर दिया गया। इस मुकदमे के फैसले की नकल, जिसमें सुपरेन्टेन्डेन्ट का बयान हुआ, बाद को महात्मा गांधी के पास रघुवीर सहाय ने भेज दी।
जेलों में उस समय अधिकांश राजनैतिक बन्दी सी क्लास में ही रखे जाते थे और जो व्यवहार उनके साथ किया जाता था वह अत्यन्त गिरा हुआ व मानवता के विरुद्ध होता था। रघुवीर सहाय ने, जो उस समय तक अपनी सज़ा की अवधि पूरी कर फ़तेहगढ़ जेल से छूटकर आ गये थे, इस सम्बंध में अनेक लेख प्रादेशिक समाचार पत्रों में प्रकाशित कराये, जैसे:—
'सत्याग्रही बन्दी' के शीर्षक से 'नेशनल हैरल्ड' में—१ फरवरी, १९४१ को।
वही, 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में—४ फरवरी, १९४१ को।
वही, 'नेशनल हैरल्ड' में—१ जुलाई, १९४१ को।
व 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में ४ जुलाई, १९४१ को।
'धारा ५२ प्रिज़नर्स ऐक्ट' — 'नेशनल हैरल्ड' में १५ जुलाई, १९४१ को।
'जेल की दशा में कोई तबदीली नहीं' — 'नेशनल हैरल्ड' में १५ जुलाई, १९४१ को।
'राजनैतिक बन्दी सताये जा रहे हैं' — 'नेशनल हैरल्ड' में १५ जुलाई, १९४१ को।
'घुटन का वातावरण जेल के अन्दर' — 'नेशनल हैरल्ड' में ११ अक्टूबर, १९४१ को।
गांधी जी से पत्र व्यवहार
उन्होंने फ़तेहगढ़ सेन्ट्रल जेल से वापस आने पर गांधी जी को एक लम्बा पत्र १-१०-४१ को लिखकर भेजा जिसमें अपने अनुभव को बताकर जो व्यवहार राजनैतिक बन्दियों के साथ किया जाता था, उस पर प्रकाश डाला। किस प्रकार धारा ५२ प्रिज़नर्स ऐक्ट का दुरुपयोग किया जाता है, उन जेल के नियमों की ओर भी गांधी जी का ध्यान आकर्षित किया जिनके पालन करने में सत्याग्रहियों को आपत्ति थी। गांधी जी ने अपने १०-१०-४१ के उत्तर में रघुवीर सहाय को उनके विस्तार के साथ पत्र लिखने पर धन्यवाद देते हुए लिखा कि "मैं सभी बातों का गम्भीरता पूर्वक अध्ययन कर रहा हूँ" अब यह गांधी जी का उत्तर गांधी स्मारक निधि, राजघाट देहली में सुरक्षित रखने के लिए भेज दिया गया है।
धारा ५२ के मुकदमे अन्य राजनैतिक बन्दियों के विरुद्ध, त्यागी जी की बीमारी
देवी दत्त काण्डपाल के अतिरिक्त महावीर त्यागी, वृज बल्लभ पर भी धारा ५२ प्रिज़नर्स ऐक्ट के अधीन मुकदमे चलाकर उनको लम्बी-लम्बी सज़ायें दे दी गईं। जेल के व्यवहार व खाने की व्यवस्था खराब होने के कारण महावीर त्यागी, बीमार पड़ गये। उनको बाद में बदायूँ के अस्पताल में इलाज के लिए भेजा गया। उस समय वह धारा ५२ के अधीन जो सज़ा हुई थी, काट रहे थे। इसकी उन्होंने डि० जज के यहाँ अपील दायर की और स्वयं बहस की, जज ने उनकी अपील मन्ज़ूर कर जेल से मुक्त होने का आदेश दे दिया।
जो सत्याग्रह करने का तरीका गांधी जी की ओर से बताया गया था वह इस प्रकार था कि सत्याग्रही कलेक्टर जिले को पत्र लिखकर यह सूचना देगा कि वह अमुक तारीख को अमुक स्थान पर पब्लिक को यह बतायेगा कि इस लड़ाई में सरकार की सहायता न रुपये पैसे और न आदमियों की भर्ती से की जाये। किसी भी प्रकार की सहायता न दी जाये। अधिकांशत: उन सब व्यक्तियों को कलेक्टर के पास चिट्ठी पहुँचते ही गिरफ़्तार कर लिया गया। उनको इस प्रकार की घोषणा करने का अवसर ही प्राप्त न होने दिया गया।
सज़ायाबी उच्च न्यायालय द्वारा अवैध
इस सम्बंध में किसी व्यक्ति ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक याचिका द्वारा इस सज़ा देने के आदेश को गलत बताया और कहा कि बिना अपराध किये ही उनको दोषी ठहराकर सज़ा कर दी गई है। उच्च न्यायालय ने इस याचिका को मन्ज़ूर कर लिया और कहा कि यह सज़ा बिल्कुल गलत है। इसी प्रकार लाहौर उच्च न्यायालय ने, जो उस समय संयुक्त भारत में था, ऐसा ही निर्णय दिया। पर इन दोनों फ़ैसलों के पहले ही अधिकतर सत्याग्रही अपनी पूरी सज़ा काट जेलों से रिहा कर दिये गये थे और इन फ़ैसलों का लाभ उनको न मिल सका।
जेल से छूट जाने पर लोगों के विचार
१९४१ के अन्त तक लगभग सभी लोग जेलों से छूटकर आ गये। केवल वह रह गये जिनको लम्बी-लम्बी अवधि की सज़ायें दी गई थीं अथवा जेल में धारा ५२ प्रिज़नर्स ऐक्ट के मातहत सज़ा काट रहे थे। पर जेल से वापस जाने पर और वातावरण को देखकर सभी यह ख़याल करने लगे कि कांग्रेस को एक बार फिर सरकार से टक्कर लेना पड़ेगी। व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन देश की स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु अन्तिम आन्दोलन नहीं माना जा सकता।
सरकार का रवय्या धन संग्रह व भर्ती के बारे में
द्वितीय विश्व युद्ध तेजी से चल रहा था। जर्मनी के कदम आगे बढ़ते जा रहे थे। ब्रिटिश सरकार भारतवर्ष को आज़ादी देने की बात सोच ही नहीं रही थी। वह भारतवर्ष से स्वेच्छा पूर्वक सहायता प्राप्त करने की इच्छुक नहीं थी। वह तो अपने सरकारी तरीकों से धन व फ़ौज के लिए भर्ती करा रही थी।
देश में उस समय का वातावरण
जापान आगे बढ़ता आ रहा था। मलाया व बर्मा से लोग भाग-भाग कर भारत आ रहे थे। ब्रिटिश सरकार आसाम, बंगाल व उड़ीसा के समुद्री तट के भागों से पीछे हटने की सोच रही थी। देश भर में एक अनिश्चित स्थिति का वातावरण फैला हुआ था। अफ़वाहें फैल रही थीं कि जापान शीघ्र ही अपनी फ़ौजों को हिन्दुस्तान में भेज देगा। आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में अन्धाधुन्द बढ़ौती हो रही थी। ऐसे समय पर भी देश के प्रतिनिधियों के हाथ में सत्ता सौंप देने की बात विदेशी शासक नहीं सोच रहे थे। भले ही उनको देश का एक बड़ा भाग जापान के सुपुर्द कर देना पड़े। इस प्रकार की डाँवाडोल स्थिति का भारतवर्ष शिकार बना हुआ था। बदायूँ के लोग भी इनसे अत्यन्त प्रभावित थे।
उभानी में राजनैतिक सम्मेलन
ऐसी अवस्था में अपने शहर व देहात के लोगों का मनोबल ऊँचा करने के विचार से रघुवीर सहाय ने अपने मित्रों के परामर्श से एक राजनैतिक सम्मेलन बुलाने का निश्चय किया। यह सम्मेलन २५ मई १९४२ को उभानी में, जो बदायूँ से ८ मील है, जहाँ रेलवे स्टेशन भी है, बड़ी मंडी है, बुलाया गया। उस समय हवाई हमलों से बचाव के लिए शासन की ओर से आदेश जारी किये गये थे कि रात के समय खुली रोशनी न की जाये। सम्मेलन, जो मौसम के कारण दिन के समय ही किया जा सकता था, इन प्रतिबन्धों के होते हुए भी किया गया। पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त, भूतपूर्व मुख्य मंत्री उत्तर प्रदेश ने सभापति का आसन ग्रहण किया। श्री महावीर त्यागी व श्रीमती विद्यावती राठौर बाहर से आईं। दो दिन सम्मेलन चला। जिले भर के सत्याग्रही उसमें सम्मिलित हुए। चौधरी तुलसी राम, जो जेल से वापस आने पर बदायूँ के बाहर चले गये थे, वह भी सम्मेलन की सूचना प्राप्त होने पर आ गये। इस अवसर पर समस्त जिले के सत्याग्रहियों को जिला कांग्रेस कमेटी की ओर से पन्त जी के हाथों प्रमाण-पत्र दिए गये। प्रमाण-पत्रों का मजमून इस प्रकार था:—
प्रमाण-पत्र का मजमून
वन्दे मातरम
आज़ादी या मौत
ज़िला कांग्रेस कमेटी, बदायूँ — प्रमाण-पत्र
तारीख़ २५ मई, १९४२
श्री ____, पिता का नाम—____, निवास स्थान—____, अभियोग—____, सज़ा की अवधि—____
प्रिय बन्धु,
पिछले सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लेने और उस सम्बंध में जेल जाने पर आपको जिला कांग्रेस कमेटी की ओर से बधाई दी जाती है। आपकी सेवायें जिला तथा देश के लिए अमूल्य हैं। आप ही जैसे सपूतों ने भारत माता की शान को बढ़ाया है। कांग्रेस आपके ऊपर गर्व करती है और आशा करती है कि भविष्य में भी आप कांग्रेस की भरपूर सहायता करते रहेंगें।
ह० बदन सिंह, एम० एल० ए०, प्रधान जिला कांग्रेस कमेटी, बदायूँ (यू०पी०) — ह० रघुवीर सहाय, मंत्री, जिला कांग्रेस कमेटी, बदायूँ (यू०पी०)
प्रमाण-पत्रों को सुरक्षित रखा गया
इन प्रमाण-पत्रों को प्राप्त करने वालों ने सुरक्षित रखा। अब भी पुराने कांग्रेसी कभी-कभी उनको अपने टीन के पोंगों में बन्द कर रखते हैं और समय पर उनको दिखाते हैं। स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद जब राजनैतिक पीड़ितों को पेन्शन देने का निश्चय किया गया तब इन प्रमाण-पत्रों से उनको अपने राजनैतिक पीड़ित होने का प्रमाण देने में काफ़ी सहायता मिली।
कांग्रेस कार्यकारिणी व अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक, इलाहाबाद में क्विट इण्डिया प्रस्ताव
इस सम्मेलन को सफल बनाने में सतीश चन्द्र वकील व दौलत राम गोयल ने विशेष रूप से प्रयत्न किया।
उभानी सम्मेलन से पूर्व अप्रैल के महीने में कांग्रेस कार्यकारिणी की व अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक इलाहाबाद में बुलाई गई। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में भाग लेने के लिए रघुवीर सहाय भी बदायूँ से गये। उस अधिवेशन में राजा जी का वह प्रस्ताव कि जिन्ना के माँगे हुए पाकिस्तान की मांग को स्वीकार किया जाय, अस्वीकार कर दिया गया। कार्यकारिणी की बैठक में महात्मा गांधी की ओर से भेजे गये प्रस्ताव का मसौदा भी रखा गया जिसमें कहा गया था कि 'अंग्रेज़ो भारत छोड़ो'। कार्यकारिणी ने विचार करने के उपरान्त उसको स्वीकार कर लिया पर किन्हीं कारणवश उसको अखिल भारतीय कांग्रेस के सम्मुख उपस्थित नहीं किया। इस प्रस्ताव पर पुन: विचार करने के लिए ७ जुलाई, १९४२ को वर्धा में कार्यकारिणी की बैठक बुलाई गई। जिसमें प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया और यह निश्चय किया गया कि इसकी पुष्टि के लिए ७ अगस्त, ४२ को बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन बुलाया जाय। इसी प्रस्ताव को क्विट इण्डिया के नाम से ख्याति प्राप्त हुई।
बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव तथा देश भर में गिरफ़्तारियाँ
७ व ८ अगस्त को बम्बई अधिवेशन में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने विचार के उपरान्त इस प्रस्ताव को पास कर दिया। महात्मा गांधी ने उक्त प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा कि प्रत्येक कांग्रेस जन को इस प्रस्ताव के पास होने के उपरान्त अपने को स्वतंत्र मानना चाहिये। आज़ादी की धारणा अपने मन में पैदा करना चाहिये। उनके कार्यों के लिये १४ सूत्रीय रचनात्मक प्रोग्राम उपस्थित है। प्रत्येक कांग्रेस जन को अपने आपको नेता मानना पड़ेगा और यही मानकर इस प्रस्ताव के प्रतिपालन हेतु या तो कार्य करना होगा अथवा अपना जीवन दान देना होगा, पर अहिंसा के सिद्धान्त का हर समय ध्यान देना होगा। इस प्रस्ताव के पास होते ही कांग्रेस के समस्त नेताओं को, जो बम्बई में उपस्थित थे, गिरफ़्तार कर इधर उधर की जेलों में बन्द कर दिया गया। सारे देश में गिरफ़्तारियों का तांता लग गया।
अगले दिन ९ अगस्त, ४२ को प्रात: पुलिस ने आकर रघुवीर सहाय को अपने निवास स्थान पर, जहाँ वह उस समय अपने दो छोटे बच्चों के साथ बात कर रहे थे, गिरफ़्तार कर लिया। उनको वहाँ से हटने नहीं दिया और गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया। बदायूँ में चारों ओर गिरफ़्तारियाँ धड़ाधड़ शुरू हो गईं। ऐसा प्रतीत होता था कि सरकार ने पहले से ही सूचियाँ तैयार कर ली थीं और ऊपर से आदेश प्राप्त होते ही गिरफ़्तार करना शुरू कर दिया। मास्टर जंग बहादुर, हर शरण वर्मा, जैगोपाल, मुं० टीकाराम, पंडित निरंजन लाल, चौ० तुलसी राम, कु० रुकुम सिंह, स्वामी श्यामानन्द इत्यादि को तुरन्त गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया। इस्लाम नगर के कृष्ण स्वरूप विद्यालंकार, वज़ीरगंज के देवकी नन्दन, व विश्वे पाल, उभानी के दौलत राम, शिव दत्त इत्यादि अनगिनत लोगों को गिरफ़्तार कर जेल में बन्द कर दिया। इनमें राधे लाल उभानी के भी थे।
चौ० बदन सिंह को चेतावनी
९ अगस्त के पूर्व जब 'अंग्रेज़ो भारत छोड़ो' का प्रस्ताव बम्बई में पास किया गया था एक अवसर पर चौधरी बदन सिंह ने रघुवीर सहाय से कह दिया था कि बम्बई में कांग्रेस निर्णय होने के पश्चात वह उनको नहीं मिलेंगें। आगे आने वाले आन्दोलन का संचालन उनको ही करना होगा। उस समय जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चौ० बदन सिंह थे, रघुवीर सहाय मंत्री की हैसियत से सारे कार्यालय का भार सँभाले हुए थे। रघुवीर सहाय को तब यह नहीं मालूम था कि वह ९ अगस्त को ही गिरफ़्तार कर लिये जायेंगे और आन्दोलन का संचालन नहीं कर पायेंगें।
फ़रार व्यक्तियों के नाम
चौ० बदन सिंह व उनके अनेक साथी रूपराज पुरी, त्रिवेणी सहाय, जैदेव आज़ाद, श्याम सिंह, राम सिंह, बुद्धि सिंह, भम्मन सिंह इत्यादि पहले से ही फ़रार हो गये थे, गिरफ़्तार न हो सके। उन्होंने अज्ञात व्यक्तियों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान जाकर अपनी योजना बनाना शुरू कर दी, जैदेव आज़ाद जो बदायूँ जिले के सैंजनी गांव के रहने वाले हैं, पहले जी० आर० पी० रेलवे पुलिस अजमेर में मुलाज़िम थे। नौकरी से त्याग-पत्र देने के बाद प्रथम बार १९४१ में सत्याग्रह किया और जेल गये। इस बार उन्होंने चौ० बदन सिंह के संचालन में काम करना आरम्भ कर नगला शर्क़ी के पास घटपुरी की तरफ़ रेलवे लाइन से किनारे लगे तार काटे, बाद को उन्होंने कुवँरगांव, जो आंवला बदायूँ सड़क पर है, के पास रास्ते के किनारे लगे तारों को काटा। चौ० बदन सिंह ने मुसलमान का वेश धारण कर लिया था, श्याम सिंह सिख भेष में रहते थे। जैदेव आज़ाद हिन्दू भेष में ही रहते थे। अधिकतर यह लोग पैदल ही घूमा करते थे। चौधरी बदन सिंह पर्दे दार सवारी के द्वारा सफ़र करते थे। कुछ समय बाद यह फ़रार व्यक्ति बुर्रा गांव में भोलानाथ के मन्दिर पर जाकर इकट्ठे हुए (यह मन्दिर उभानी कस्बे के निकट है) और कई दिन तक वहाँ ठहर कर अपनी आगे की योजनायें बनाते रहे। चौ० बदन सिंह मन्दिर पर न रुक कर खेतों में छिप रहे और आपस में आने-जाने का सिलसिला जारी रहता था। इन सब लोगों के वहाँ इकट्ठा होने की सूचना प्राप्त होने पर उभानी पुलिस ने मन्दिर पर छापा मारा और जैदेव आज़ाद, जो उस समय रात के वक्त सो रहे थे, उनको गिरफ़्तार कर थाने ले आये। जैदेव के अन्य साथी किसी प्रकार वहाँ से निकल आये और गिरफ़्तार न हो सके। पुलिस ने जैदेव आज़ाद को बुरी तरह से मार लगाई। इस मारपीट में एक सी० आई० डी० का इन्सपेक्टर भी शरीक था जो बाद में जब कांग्रेस सरकार बनी, अपने पद से हटा दिया गया। जैदेव आज़ाद जब जेल में दाखिल हुए उस समय उनके शरीर पर काफ़ी चोटें थीं। बदायूँ जेल में वह उसी बैरक में रखे गये जिसमें रघुवीर सहाय व अन्य बदायूँ के लोग बन्द थे।
बितरोई स्टेशन व मछुरिया स्टेशन काण्ड
बुर्रा के मन्दिर पर से प्रस्थान कर बाकी फ़रार व्यक्ति, पं० त्रिवेनी सहाय, राम सिंह, भम्मन सिंह, बुद्धि सिंह आदि चौ० बदन सिंह के साथ बितरोई स्टेशन पर पहुँचे और उसको आग लगा दी और सरकारी सामान को नष्ट कर दिया। इस घटना के बाद यह लोग कुछ समय तक अलग-अलग घूमते फिरते रहे बाद को सब राम सिंह के गांव रेवाड़ा तहसील गुन्नौर में जाकर इकट्ठे हुए और एक दूसरी योजना बनाई। उसी के अनुसार चन्द ही दिनों के बाद जिला मुरादाबाद में मछुरिया स्टेशन को मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी।
चौधरी बदन सिंह की गिरफ़्तारी
इस घटना के पश्चात चौधरी बदन सिंह चन्दौसी के करीब गुमुठिया गांव में एक आपरेटर के मकान से गिरफ़्तार कर मुरादाबाद जेल भेज दिये गये। उनके अन्य साथी भी धीरे-धीरे गिरफ़्तार कर लिये गये या स्वयं आकर गिरफ़्तार हो गये। उन सब पर मुकदमे कायम कर लम्बी-लम्बी सज़ायें देकर पृथक-पृथक जेलों में भेज दिया गया।
मछुरिया रेलवे स्टेशन काण्ड में गुलाब शंकर आसफ़पुर व कमल चँदौसी भी शामिल थे। बाद में पुलिस ने गुलाब शंकर के मकान को आसफ़पुर गांव में बहुत नुक़सान पहुँचाया और कुर्की कर ली।
गोवर्धन सिंह द्वारा किये गये तोड़-फोड़ के कार्य
इधर चौ० बदन सिंह अपने साथियों द्वारा जिले के अनेक भागों में समय-समय पर जाकर तोड़-फोड़ के कार्य करते रहे। उधर गोवर्धन सिंह पुत्र कु० रुकुम सिंह, जो उस समय हरदोई जिले में केन सुपरवाइजर थे, अपना पद त्याग कर ११-८-४२ को बदायूँ पहुँच गये। उसी रात को उन्होंने अपने साथ राम स्वरूप सिंह, जो अब वकील हैं, भम्मन सिंह व अपने बड़े भाई राम स्वरूप सिंह व कल्यान सिंह को लेकर अलापुर के पास जाकर रेलवे लाइन उखाड़ी। यह लोग सब ग्राम नगला शर्क़ी के ही निवासी थे जो रेलवे लाइन के पूरब की ओर शहर के पास बसा हुआ है।
रेल के तार काटे
इसके पश्चात गोवर्धन सिंह ने ही फिर राम स्वरूप सिंह, राम चरन, रूप सिंह आदि को लेकर मोहल्ला ब्रह्मपुर शहर के अन्दर जाकर टेलीफ़ोन के तार काटे। थोड़े ही दिनों के बाद १३ सितम्बर, ४२ को इन्हीं लोगों ने अलापुर के जंगल में रेल के तार काट दिये और रेल की पटरी पर बम्ब रखा जिसके फटने के फलस्वरूप रेल गाड़ियों के आने-जाने में रुकावट पैदा हो गई।
गवर्नमेन्ट हाई स्कूल बदायूँ का काण्ड
उन्हीं दिनों गवर्नमेन्ट हाई स्कूल बदायूँ के चन्द विद्यार्थियों ने, जिनमें सत्येन्द्र वकील के भाई राजेन्द्र वर्मा, जो अब प्रिन्सपल ए० बी० इन्टर कालेज हल्द्वानी हैं, सुधाकर शर्मा जो अब डिप्टी डाइरेक्टर आफ़ एजूकेशन हैं, गुरहाई के पंतजली जो आज कल मिलिट्री में मेजर हैं, स्कूल के एक कमरे में घुसकर आग लगा दी, जिसके फलस्वरूप स्कूल का बहुत सा सामान नष्ट हो गया। यह सब विद्यार्थी बाद में गिरफ़्तार कर लिये गये और हवालात में रखे गये पर बाद को शनाख्त न होने के कारण छोड़ दिये गये।
गोवर्धन सिंह द्वारा किये गये अन्य तोड़-फोड़ के कार्य—योगेश चटर्जी व गोवर्धन सिंह की गिरफ़्तारी
१६ अक्टूबर ४२ को पुन: गोवर्धन सिंह ने योगेश चटर्जी के साथ, जो बाद को राज्य सभा के सदस्य बनाये गये और जिनका सारा जीवन क्रान्ति-कारी कार्यों में ही व्यतीत हुआ, अलीगढ़ स्टेशन पर बम्ब फेंका, तत्पश्चात वह और मुकुन्द सिंह सहारनपुर, पुत्तू सिंह व राम लड़ैते पांडे मैनपुरी जब बदायूँ और कासगंज के बीच बड़ी गंगा के रेल के पुल को उड़ाने के विचार से सोरों होकर आ रहे थे तो पुलिस स्टेशन सोरों के सामने तिलक राम थानेदार से मुठभेड़ हो गई। थानेदार ने उन लोगों पर गोली चलाई। इन लोगों ने भी गोली का जवाब गोली से दिया और उसी समय गिरफ़्तार कर लिये गये। वहाँ से एटा जेल भेज दिये गये जहाँ गोवर्धन सिंह व योगेश चटर्जी पर एक स्पेशल कोर्ट द्वारा मुकदमे की सुनवाई हुई। तत्पश्चात चटर्जी को १० साल की कड़ी सज़ा व गोवर्धन सिंह को ३ साल की कड़ी सज़ा का हुक्म सुना दिया गया। गोवर्धन सिंह अपनी पूरी सज़ा काटने के पश्चात दो माह नज़र बन्द रखे गये और फिर १९४५ में रिहा किये गये। योगेश चटर्जी की भी तभी रिहाई कर दी गई।
श्री सियाराम वकील द्वारा सहायता व परामर्श
१९४२ के 'अंग्रेज़ो भारत छोड़ो' आन्दोलन के आरम्भ होने के काफ़ी दिन पूर्व ही योगेश चटर्जी फ़रार हो गये थे। उसी समय गोवर्धन सिंह पुत्र कु० रुकुम सिंह से भी उनकी जानकारी हुई। जब तक तोड़-फोड़ का आन्दोलन जिले में चलता रहा और अनेक व्यक्ति फ़रारी की हालत में रहे, उस समय स्वर्गीय श्री सियाराम वकील का उन सब ही से सम्पर्क बना रहता था। वह उनकी समय-समय पर आर्थिक सहायता भी करते थे। अनेक व्यक्तियों ने उनके ही परामर्श पर आत्मसमर्पण कर अपने को गिरफ़्तार कराया था।
जेल के अन्दर का भयानक वातावरण
९ अगस्त, ४२ के पश्चात जब जिले के कोने-कोने से धड़ाधड़ गिरफ़्तारियाँ होकर कांग्रेस जन जेल में आने लगे तो उनके साथ अनेक व्यक्तियों को, जिनका कांग्रेस से कोई सम्बंध इससे पूर्व नहीं रहा था और जिन्होंने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से किसी पहले आन्दोलन में भाग नहीं लिया था, उनको भी गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया। उन लोगों से दर्याफ़्त करने पर मालूम हुआ कि उनको 'गुण्डा एक्ट' में गिरफ़्तार कर जेल भेजा गया था। सभी कांग्रेसी व गैर कांग्रेसी एक ही साथ जेल के भीतर रखे जाते थे। उस समय जेल के अन्दर न अख़बार आने की इजाज़त थी न किसी से मुलाक़ात की जा सकती थी न किसी प्रकार का पत्र व्यवहार किया जा सकता था। सारे जेल में भयानक वातावरण छाया हुआ था। जो ख़बरें मिलती थीं उनसे मालूम पड़ता था कि सरकार की ओर से स्थान-स्थान पर गोली चलाई गई है और जो लोग उस समय जेलों में बन्द कर दिये गये हैं उनको छोड़ा नहीं जायगा। उनके ऊपर से बम्ब वर्षा कर खत्म कर दिया जायेगा। जो फ़रार व्यक्ति समय-समय पर गिरफ़्तार कर जेल में आते थे, उनसे भी इन सब बातों की पुष्टि होती थी।
गोली चलाये जाने से मरे व घायलों की संख्या
सरकारी आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में ९ अगस्त और १ अगस्त के बीच २८ बार गोली चलाई गई जिसके फलस्वरूप ७६ आदमी मरे व ११४ को गम्भीर चोटें आईं। ९ अगस्त और ३० नवम्बर के बीच सिक्रेटरी आफ़ स्टेट फ़ार इण्डिया के अनुसार १००८ व्यक्तियों की जानें गईं और ३२७५ गम्भीर रूप से घायल हुए। जेल में भेजे गये लोगों की संख्या एक लाख से अधिक थी।
बरेली सेन्ट्रल जेल में जो उस समय बन्द थे
इस बार रघुवीर सहाय, कु० रुकुम सिंह इत्यादि पर मुकदमा न चलाकर उनको नज़र बन्द रखा गया। उनके खिलाफ़ किसी प्रकार का आरोप लगाकर कोई नोटिस भी नहीं दिया गया। थोड़े दिनों के पश्चात वह दोनों बरेली सेन्ट्रल जेल भेज दिये गये, जहाँ प्रान्तों के अन्य स्थानों से भी नज़र बन्द व्यक्तियों को भेजा गया था। बरेली सेन्ट्रल जेल में उस समय श्री कृष्ण दत्त पालीवाल, सेठ अचल सिंह आगरे के, सत्यरंजन बख्शी कलकत्ते के, नारायण प्रसाद अरोड़ा, प्यारे लाल अग्रवाल कानपुर के, बीरबल सिंह व राजाराम शास्त्री काशी विद्यापीठ के, गेंदा सिंह देवरिया के आदि-आदि थे। नज़रबन्दों को किसी बाहर के व्यक्ति से मिलने की इजाज़त नहीं थी। बाहर का हाल जब ही मालूम होता जब कोई नया नज़रबन्द दूसरे स्थान से वहाँ आता था—पत्र व्यवहार की कोई इजाज़त नहीं थी।
कम्युनिस्टों का व्यवहार
बहुत बड़ी संख्या में नज़र बन्द व्यक्तियों के एक ही लम्बी-चौड़ी बैरक में जमा होने के कारण समय कटता गया। उसी बैरक में थोड़े से कम्युनिस्ट एक तरफ़ को रहते थे जिनका कोई सरोकार व्यक्तिगत सत्याग्रह, आन्दोलन या 'अंग्रेज़ो भारत छोड़ो आन्दोलन' से न था। इन दोनों आन्दोलनों की वह खुल्लम-खुल्ला खिल्ली उड़ाया करते थे।
नज़रबन्द व्यक्तियों की रिहाई
जेल में रहते काफ़ी समय बीत जाने के बाद जब विश्व युद्ध में अमेरिका ने भारी मात्रा में अंग्रेज़ों को मदद देना आरम्भ कर दिया और स्वयं अपनी फ़ौजें भेजकर युद्ध में भाग लेना शुरू कर दिया तब अंग्रेज़ों की फतह होने लगी। जर्मनी पीछे हटने लगा। तब धीरे-धीरे नज़र बन्दों की रिहाई शुरू हो गई। रघुवीर सहाय भी १० नवम्बर, १९४३ को रिहा होकर बदायूँ पहुँच गये।
बदायूँ में आतंक का वातावरण—कन्ट्रोल व राशनिंग का दौर दौरा
बदायूँ में उस समय आतंक का वातावरण फैला हुआ था। लोग भयभीत थे। कन्ट्रोल व राशनिंग चल रहे थे। कोई भी आवश्यक वस्तु उपलब्ध नहीं थी। चीनी, मिट्टी का तेल, कपड़ा, सब ही पर कन्ट्रोल लगे हुये थे। चोर बाज़ारी का बोल बाला था, इने गिने लोगों को कन्ट्रोल के माल बेचने के लाइसेन्स दिये गये थे, जो अधिक से अधिक लाभ उठा रहे थे। बाज़ार में अन्य व्यापार करने वाले हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते थे। उनमें बड़ा असन्तोष था। उनका रोज़गार तो करीब-करीब खत्म-सा हो गया था। जिले के सप्लाई दफ़्तर के हाथों में ही सारा व्यापार सीमित हो गया था। इस विभाग के अधिकारी या इन्सपैक्टर्स का बोल-बोला था। जिधर से निकल जाते थे सन्नाटा छा जाता था। जिसको चाहे गिरफ़्तार कर मुकदमा चला, जेल भेज देते थे।
भ्रष्टाचार सम्बंधी तथ्यों का समाचार पत्रों में प्रकाशित कराना
रघुवीर सहाय के बदायूँ पहुँचने पर अगले दिन ही से अनेकों व्यक्तियों ने आकर उनको सब हाल सुनाना शुरू कर दिया। जो जो कठिनाइयाँ उनके सामने आ रही थीं, उनका वर्णन किया। वह स्वयं भी इसी नतीजे पर पहुँचे कि सप्लाई विभाग ने धांधली मचा रखी है और कलेक्टर व सप्लाई आफ़ीसर की यह सब जानकारी में है। भ्रष्टाचार बुरी तरह से फैला हुआ है। साधारण जनता परेशान है और भयभीत है। स्थिति के अध्ययन के पश्चात उन्होंने समय-समय पर अंग्रेज़ी के प्रादेशिक पत्रों में समाचार के रूप में बदायूँ के तथ्यों को प्रकाशित कराया। पर उनका बदायूँ के अधिकारियों पर कोई असर न हुआ। विश्वयुद्ध अभी चल रहा था। अधिकारी वर्ग विशेष कर कलेक्टर व सप्लाई आफ़ीसर म्यूज़िक कान्फ्रेंस, दंगल आदि का आयोजन कर पुलिस द्वारा बड़ी बड़ी रकमें चन्दे की वसूल किया करते थे, जिनके कारण और भी असन्तोष जनता में पैदा होता था।
सार्वजनिक सभा में रघुवीर सहाय का भाषण और अधिकारियों के प्रति आरोप
ऐसे वातावरण में एक दिन एक सार्वजनिक सभा में, जो दयानन्द सेवा आश्रम में हुई, रघुवीर सहाय ने अपने भाषण में कहा कि जो शोचनीय स्थिति इस समय बदायूँ में फैली हुई है जिसमें आवश्यक वस्तुओं का मिलना दुश्वार हो रहा है, कीमतें अनाप शनाप बढ़ रही हैं, भ्रष्टाचार बुरी तरह से फैला हुआ है, इस सब की ज़िम्मेदारी यहाँ के कलेक्टर व सप्लाई आफ़ीसर की है। वह दोषी हैं और 'वार क्रिमनल्स' हैं। जब कभी शासन जनता के प्रतिनिधियों के हाथ में आयेगा, इनके विरुद्ध मुकदमे चलाकर इनको दण्ड दिया जायगा। इस भाषण को सी० आई० डी० ने जो सभा स्थल पर मौजूद थी, नोट कर लिया और तुरन्त ही कप्तान पुलिस व कलेक्टर के पास भेज दिया।
मुकदमा चलाने की अनुमति प्राप्त करने हेतु लखनऊ के लिए रवाना
अगले दिन यह खबर फैल गई कि कलेक्टर, जो एक आई० सी० एस० थे व सप्लाई आफ़ीसर जो पी० सी० एस० थे, रघुवीर सहाय के भाषण को लेकर लखनऊ जा रहे हैं, वहाँ वह उनके खिलाफ़ मुकदमा दायर करने की अनुमति प्राप्त करेंगे। दोनों ही अधिकारी लखनऊ में मुडी चीफ़ सेक्रेटरी से मिले और उन्हें रघुवीर सहाय के भाषण को पढ़कर सुनाया और मुकदमा चलाने की अनुमति के लिए कहा। तब मुडी ने अपने निजी सचिव को बदायूँ फ़ाइल लाने का आदेश दिया। फ़ाइल के आ जाने पर उसमें उन सब समाचार पत्रों की कर्टिंग्स एकत्रित थीं, जिनमें रघुवीर सहाय ने बदायूँ सम्बंधी तथ्य प्रकाशित कराये थे। उन सब में ही सप्लाई विभाग की शिकायतें थीं। फ़ाइल में उन सब कर्टिंग्स पर लाल पेन्सिल के निशान बने हुए थे। मुडी ने एक एक कर्टिंग को लेकर दोनों अधिकारियों के सामने रख कर दर्याफ़्त किया कि उनका ध्यान इन समाचारों की ओर गया या नहीं, यदि गया तो उन्होंने इनके सम्बंध में क्या कार्यवाही की। दोनों अधिकारियों के यह कहने पर कि उन्होंने कोई कार्यवाही नहीं की, मुडी ने तुरन्त कलेक्टर को प्रतापगढ़ जाने के और सप्लाई आफ़ीसर को बनारस जाने के आदेश दे दिये। दोनों ने ही बदायूँ वापस आकर अपने मित्रों को यह सब बातें बताईं। नगर का वातावरण ही बदल गया। लोगों को बड़ी खुशी हुई। रघुवीर सहाय के खिलाफ़ मुकदमा चलाने की बात खत्म हो गई। दोनों अधिकारी जिले से चले गये।
स्लार्क कलेक्टर की तत्परता, सप्लाई आफ़ीसर के विरुद्ध मुक़दमा व उसमें उनको सज़ा
कलेक्टर के चले जाने के बाद स्लार्क कलेक्टर होकर आये, जिन्होंने बड़ी सूझ बूझ व तत्परता से काम करना आरम्भ किया और जो पहले धांधली का वातावरण पैदा हो गया था, उसको समाप्त करने का भरसक प्रयत्न किया। उनको विश्वास हो गया था कि जो शिकायतें रघुवीर सहाय ने समय-समय पर की हैं, वह बिल्कुल सही हैं और उनके लिए पहले वाले अधिकारी ही जिम्मेदार थे। अपनी रिपोर्ट में, जो उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार को भेजी, यह बातें लिख दीं। बाद को जब कांग्रेस मंत्री मंडल ने कार्य भार सँभाला तो उसने पुलिस द्वारा इस सब मामले की जाँच के आदेश दे दिये। जाँच के परिणाम स्वरूप सप्लाई आफ़ीसर, जिनका तबादला बनारस को कर दिया गया था, उन पर मुकदमा चलाया गया, जिसकी सुनवाई बरेली में एक मजिस्ट्रेट के सामने हुई। उसमें वह दोषी साबित हुये और उनकी सज़ा हुई। इस फैसले के खिलाफ़ उन्होंने उच्च न्यायालय में अपील दायर की परन्तु उसकी सुनवाई से पहले ही उन्होंने आत्म हत्या कर ली।
इधर गांधी जी भी ८ मई, १९४४ को आगा खाँ पैलेस से रिहा कर दिये गये। उनके साथ महादेव देसाई ९ अगस्त को पकड़े गये थे और गांधी जी के साथ ही आगा खाँ पैलेस में रखे गये थे, उनकी मृत्यु १५ अगस्त को हो गई और उनका अन्तिम संस्कार भी आगा खाँ पैलेस के एक स्थान पर कर दिया गया। कस्तूरबा गांधी भी गांधी जी के साथ ही रखी गई थीं। उनकी मृत्यु २२ फरवरी, १९४४ को हुई। उनकी भी अन्त्येष्टि उसी के समीप स्थान पर कर दी गई। गांधी जी ने पत्र व्यवहार, जो उनके व वायसराय के बीच पिछले दो वर्ष में हुआ था, उसको प्रकाशित करा दिया और अपना एक वक्तव्य भी प्रकाशित कराया। जो निराधार आरोप गवर्नमेन्ट की ओर से गांधी जी के ऊपर लगाये गये थे कि कांग्रेस ने हिंसात्मक आन्दोलन का रूप धारण कर देश में हिंसा को फैलाया उसके उत्तर में उन्होंने बताया कि वह सत्य व अहिंसा में अटूट विश्वास रखते हैं। उन्होंने सदा कांग्रेस को उसी रास्ते पर चलने को कहा है। जो हिंसा की घटनायें देश में हुई हैं और जो हिंसा का वातावरण फैला, उसकी पूरी-पूरी जिम्मेदारी सरकार की नीतियों पर है। सरकार ने सभी कांग्रेस नेताओं को व कार्यकर्ताओं को एक समय समूचे देश में गिरफ़्तार कर जेल में बन्द कर दिया और भयंकर दमन नीतियों को लागू कर दिया। इस कारण लोग पागल हो गये और उचित अनुचित का भेद न कर सके। सारी हिंसात्मक घटनाओं के लिए उन्होंने सरकार को दोषी ठहराया।