अध्याय 8 / 11
नये चुनाव, विदेशी शासन का अन्त, देश का विभाजन
1944–47
यह पुस्तक १९७४ में हिंदी में लिखी गई थी और यहाँ ठीक वैसे ही प्रस्तुत है जैसे प्रकाशित हुई थी — इसका अनुवाद नहीं किया गया है। मेनू व नेविगेशन भाषा बदलते हैं; पुस्तक का पाठ नहीं बदलता।
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गांधी जी व जिन्ना की बातचीत बम्बई में
जेल से रिहाई के तुरन्त बाद गांधी जी ने देश की स्थिति का मूल्यांकन करना आरम्भ कर दिया। इधर जब वह आगा खाँ पैलेस में बन्द थे उस समय जिन्ना ने ऐसा विचार प्रकट किया था कि यदि गांधी मुझसे बातचीत करना चाहते हैं तो मैं तैयार हूँ। उन्होंने अपनी रिहाई के बाद जिन्ना को पत्र लिखकर कहा कि मैं आपसे मिलने को उत्सुक हूँ। जिन्ना ने इस पत्र के उत्तर में गांधी जी से मिलने की अनुमति दे दी। तदोपरान्त गांधी जी, जिन्ना से उनके निवास स्थान पर बम्बई में मिले। कई दिन तक दोनों के बीच में बातचीत चलती रही पर अन्त में कोई परिणाम नहीं निकला।
लार्ड वेवल की नियुक्ति वायसराय के पद पर—उनका वक्तव्य
द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था। पहले जर्मनी ने हथियार डाल दिये। इसके बाद जापान भी परास्त हो गया। लार्ड लिनलिथगो वायसराय अपना कार्य-काल समाप्त कर भारतवर्ष से जा चुके थे, उनके स्थान पर लार्ड वेवल की नियुक्ति कर दी गई। उन्होंने ब्रिटिश सरकार की सम्मति से भारतवर्ष के राजनैतिक नेताओं से एक वक्तव्य के आधार पर बातचीत करना शुरू कर दी जो पार्लियामेन्ट में शासन की ओर से दिया गया था, जिसका आशय यह था कि:—
१—ब्रिटिश सरकार भारत में कोई ऐसा विधान लागू नहीं करना चाहती जो वहाँ के मुख्य सम्प्रदायों की इच्छा के विरुद्ध हो।
२—वायसराय की एक्ज़ीक्यूटिव कौन्सिल के सदस्य राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों में से भी नियुक्त किये जायेंगे, जिसमें हिन्दू मुसलमानों की संख्या बराबर-बराबर होगी।
३—इस सम्बन्ध में वायसराय एक सम्मेलन बुलायेंगे जिसमें राजनैतिक दलों के नेतागण व जो प्रान्तीय विधान सभाओं के मुख्य मंत्री पद पर रह चुके हैं, भाग लेंगे।
सम्मेलन व उसका परिणाम
यह सब बातें लार्ड वेवल ने अपने एक वक्तव्य में बताईं, जो १४ जून, १९४५ को प्रकाशित हुआ। इसके फलस्वरूप शिमला में २५ जून को सम्मेलन बुलाया गया, जिसमें कांग्रेस व मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों के अलावा अन्य लोगों ने भी भाग लिया पर कोई सर्व सम्मति से निष्कर्ष नहीं निकला, क्योंकि मुस्लिम लीग को यह स्वीकार नहीं था कि एक्ज़ीक्यूटिव कौन्सिल के लिए कांग्रेस अपनी सूची में किसी मुसलमान का नाम भी दे। लीग का कहना था कि कांग्रेस केवल हिन्दुओं के नाम दे जो कांग्रेस को स्वीकार न था। सम्मेलन असफल रहा यह बात लार्ड वेवल ने बाद को सबको बता दी।
वायसराय द्वारा नये चुनावों की घोषणा व बदायूँ में पन्त जी का आना व उम्मीदवारों का चयन
इसी समय वायसराय ने एक घोषणा के द्वारा प्रान्तीय विधान सभाओं व केन्द्रीय असेम्बली को भंग कर नये चुनावों के लिए आदेश जारी कर दिये। सारे देश में चुनावों का वातावरण फैल गया, उत्तर प्रदेश में भी पन्त जी व रफ़ी अहमद साहब ने प्रत्येक जिले में जाकर उम्मीदवारों का चयन शुरू कर दिया। बदायूँ में पन्त जी आये। सभी कांग्रेस कार्यकर्ताओं से बातचीत कर और अपनी राय कायम कर वापस चले गये। बाद को उत्तर प्रदेश पार्लियामेन्ट्री बोर्ड द्वारा स्वीकृत नामों की सूची प्रकाशित होने पर ज्ञात हुआ कि बदायूँ जिले से रघुवीर सहाय व चौधरी बुद्धी सिंह का चयन किया गया है। चौधरी बुद्धी सिंह मुरादाबाद जिले के रहने वाले थे। चौधरी बदन सिंह यद्यपि इस समय तक जेल से रिहा होकर आ गये थे, पर वह कानूनी प्रतिबन्धों के कारण चुनाव लड़ने के अयोग्य थे। उन्हीं के स्थान पर चौधरी बुद्धी सिंह को रखा गया था। चुनाव में रघुवीर सहाय व चौधरी बुद्धी सिंह दोनों ही सफल हुए और तीसरे श्री लाखनदास हरिजन स्थान से। जब कांग्रेस मंत्री मंडल बन जाने पर चौधरी बदन सिंह के ऊपर लगे हुये प्रतिबन्ध हटा लिये गये तो चौधरी बुद्धी सिंह ने त्याग-पत्र देकर स्थान रिक्त कर दिया। बाई इलेक्शन में चौधरी बदन सिंह विजयी हुये।
कांग्रेस व मुस्लिम लीग दोनों ही विधान सभा में पहुँची
इन चुनावों में उत्तर प्रदेश से कांग्रेस की भारी जीत हुई पर यह जीत अधिकांश हिन्दू स्थानों से ही हुई। मुस्लिम लीग ने मुस्लिम स्थानों पर अपने उम्मीदवार खड़े किये जो भारी सफलता प्राप्त कर उत्तर प्रदेश विधानसभा में काफ़ी संख्या में पहुँचे और एक-एक पग पर उसके कार्यों में बाधा डाली।
टेढ़ी समस्यायें विधान सभाओं के सम्मुख
बंगाल, पंजाब व सिंध को छोड़कर देश के सभी प्रदेशों में कांग्रेस सरकार पुनः बन गई। फ्रन्टियर प्रान्त में भी कांग्रेस सरकार का निर्माण हो गया। समस्त देश के सम्मुख उस समय बड़ी टेढ़ी समस्याओं का समाधान करना था। आवश्यक चीज़ों की कमी, कीमतों में वृद्धि, भ्रष्टाचार, शान्ति व्यवस्था अस्त व्यस्त इत्यादि, इधर मुस्लिम लीग की ओर से प्रतिदिन उद्दण्डता का व्यवहार किया जा रहा था।
समस्याओं के समाधान हेतु समुचित उपाय
उत्तर प्रदेश कांग्रेस मंत्री मंडल ने इन सभी समस्याओं को हल करने के अपने प्रयत्न आरम्भ कर दिये। अनाज की समस्या को सुलभाने हेतु उन्होंने निश्चय किया कि गल्ला काश्तकारों से लगान के एवज़ में खरीद कर खरीदारों को उचित मूल्य पर बेचा जाये। गांव में कपड़े की कमी को दूर करने के लिए उसके वितरण का प्रबन्ध किया जाये। स्थान-स्थान पर कपड़े की दुकानें खुलवा दी गईं। भ्रष्टाचार रोकने के वास्ते एक वातावरण तैयार किया गया जिसके परिणाम स्वरूप काफ़ी मात्रा में सफलता प्राप्त हुई। सरकारी अधिकारियों के दृष्टिकोण को बदलने का भी प्रयास किया गया। विधान सभा के कांग्रेसी सदस्यों से भी शासन को सुदृढ़ बनाने हेतु सहयोग लिया गया।
जमींदारी उन्मूलन—विधान सभा द्वारा
इधर काश्तकारों की शोचनीय अवस्था को ध्यान में रखते हुए, जिनका हर प्रकार से शोषण किया जा रहा था, जमींदारी प्रथा को प्रान्त में समाप्त करने हेतु एक प्रस्ताव श्री रफ़ी अहमद किदवई ने विधान सभा में उपस्थित किया जिसका अनुमोदन रघुवीर सहाय ने किया। प्रस्ताव पास होने के पश्चात एक कमेटी की स्थापना कर दी गई जो इस प्रश्न पर हर पहलू से विचार करने के पश्चात अपनी रिपोर्ट दे। उस रिपोर्ट के प्राप्त होने पर एक विधेयक विधान सभा के समक्ष उपस्थित किया गया जो बड़े वाद विवाद के बाद पारित किया गया।
मुस्लिम लीग द्वारा कड़ा विरोध, ग्राम पंचायत विधेयक
वैसे तो उत्तर प्रदेश में तालुक़ेदार व जमींदार बड़ी संख्या में हिन्दू व मुसलमान दोनों ही थे उन सब पर ही इस विधेयक का असर पड़ने जा रहा था पर मुस्लिम लीग के सदस्यों ने विशेषकर इसका कड़ा विरोध किया। पग-पग पर रुकावटें डालनी शुरू कर दीं और सदन की कार्यवाही में बाधक सिद्ध होने लगे। एक लम्बे अर्से के बाद यह विधेयक पारित हो सका। इस विधेयक के साथ ही साथ ग्राम पंचायत विधेयक भी लाया गया जो समस्त देश में अपने ढंग का प्रथम विधेयक था। बाद को अनेक प्रान्तों ने उसी के आधार पर अपने यहाँ ग्राम पंचायतों के कानून बनाये।
आनरेरी मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति के बारे में विचार, अंग्रेज़ी के स्थान पर हिन्दी
प्रदेश में कांग्रेस मंत्री मंडल का ध्यान न्याय व्यवस्था की ओर भी गया और इस कारण शासन को न्याय से अलग करने के सिलसिले में कई कदम उठाये। रघुवीर सहाय ने आनरेरी मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति के सम्बंध में प्रश्न उठाकर बताया कि जिस प्रकार और जिन योग्यताओं के आधार पर इस समय आनरेरी मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति की जाती है वह बन्द की जाये। इस प्रश्न पर काफ़ी वाद विवाद विधान सभा के अन्दर बाहर समाचार पत्रों द्वारा चलता रहा। प्रदेश शासन की ओर से उनकी नियुक्ति के नियम बदल दिये गये। इसी समय श्री पुरुषोत्तम दास टंडन स्पीकर विधान सभा की उपस्थिति में यह भी निश्चय हुआ कि अंग्रेज़ी के स्थान पर हिन्दी द्वारा विधान सभा अपना सब कार्य करे।
इंगलैण्ड में नये चुनाव, लेबर पार्टी की सरकार बनी, एटली द्वारा घोषणा
यह सब कार्य विधान सभा द्वारा हो रहा था। उधर ब्रिटिश शासन की ओर से भी पहल प्रारम्भ हो गई जिसके परिणाम स्वरूप कांग्रेस की मांग, नेशनल गवर्मेन्ट कायम करने के बारे में विचार विनिमय होने लगा। सबको यह प्रतीत होने लगा कि भारतवर्ष की आज़ादी अब दूर नहीं है। जर्मनी के हथियार डाल देने पर कन्ज़रवेटिव व लेबर की मिली जुली सरकार, जो लड़ाई के दौरान इंगलैण्ड में शासन चला रही थी, समाप्त हो गई। नये चुनाव कराने पड़े जिनके परिणाम स्वरूप लेबर बहुमत में आई और उन्होंने अपनी गवर्नमेन्ट बनाई। एटली प्राइम मिनिस्टर बनाये गये। उन्होंने अपने पद ग्रहण के थोड़े दिन बाद ही भारतवर्ष के सम्बंध में एक घोषणा कर बताया कि:—
१—भारतवर्ष को स्वयं अपना संविधान बनाने का अधिकार प्राप्त होगा।
२—वह यह भी निर्णय करेगा कि भारतवर्ष कामन वेल्थ में रहे या न रहे।
३—अल्प जातियों को भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करने में बाधक होने नहीं दिया जायेगा।
४—तीन केबिनेट सदस्यों का मिशन बनाकर भारतवर्ष में भेजा जा रहा है।
देश भर में स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु आशायें बढ़ गईं, मुस्लिम लीग द्वारा विरोध व पाकिस्तान की माँग
इस मिशन के सदस्य पैथिक लारेन्स, स्टेफ़ोर्ड क्रिप्स व एलबर्ट एलेक्ज़ेन्डर थे जो भारतवर्ष में २१ मार्च, १९४६ को पहुँच गये और उन्होंने अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया। इस घोषणा के बाद और कैबिनेट मिशन के सदस्यों के भारतवर्ष में आने के बाद यह धारणा और भी दृढ़ हो गई कि हिन्दुस्तान अब शीघ्र आज़ाद हो जायगा। मुस्लिम लीग को विश्वास हो गया था कि भारतवर्ष आज़ाद होकर रहेगा। कैबिनेट मिशन ने अपनी ओर से अनेक प्रस्ताव भारतवर्ष की स्वतंत्रता के सम्बन्ध में राजनैतिक नेताओं के सम्मुख प्रस्तुत किये। इन पर विचार करने के लिए शिमला में कांग्रेस व लीग के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन ५ मई से १२ मई तक हुआ। अन्त में सम्मेलन विफल रहा। मुस्लिम लीग किसी भाव समझौते पर तैयार न हुई। वह पाकिस्तान की माँग पर अड़ गई।
अस्थाई सरकार केन्द्र में स्थापित हो व संविधान बनाने वाली सभा का गठन
इन्हीं प्रस्तावों के आधार पर एक अस्थाई सरकार केन्द्र में बनाने की बात भी सामने आई, जिसको १८ जून, १९४६ को कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया। इसके अतिरिक्त कैबिनेट मिशन ने अन्य प्रस्ताव भी रखे जैसे कि हिन्दू-मुस्लिम बहुमत के आधार पर प्रान्त एक या दूसरे ग्रुप में शामिल होकर अपने प्रतिनिधि संविधान बनाने वाली सभा में भेजें। इन प्रस्तावों के फलस्वरूप प्रान्तों को पूर्ण स्वायत्त शासन के अधिकार प्राप्त होंगे। केन्द्र में केवल रक्षा, अन्तर्राष्ट्रीय प्रश्न व यातायात के विषय में ही चर्चा हो सकेगी।
मुस्लिम लीग की ओर से डाइरेक्ट एक्शन डे की घोषणा
मुस्लिम लीग ने अन्त में वह सभी योजनायें, जो कैबिनेट मिशन की ओर से बनाई गई थीं अस्वीकार कर दीं जो आंशिक स्वीकृति पहले दी भी थी उसको वापस ले लिया और रुष्ट होकर २१ जून, १९४६ को 'डाइरेक्ट एक्शन डे' मनाने का निश्चय भी कर दिया।
डाइरेक्ट एक्शन डे के परिणाम
बंगाल में उस समय सोहरावर्दी की मुस्लिम लीग मिनिस्ट्री सत्तारूढ़ थी। सारे बंगाल में उस दिन दफ़तर बन्द करने की घोषणा सोहरावर्दी ने कर दी। स्वयं मुस्लिम लीग के सशस्त्र लोगों के जुलूस का नेतृत्व करके हावड़ा से चलकर कलकत्ता शहर में जुलूस निकाला जिसके कारण चारों ओर आतंक फैल गया।
तुरन्त ही मार धाड़ शुरू हो गई जिसके परिणाम स्वरूप कलकत्ता शहर में सब काम बन्द हो गया। 'डाइरेक्ट एक्शन डे' के अवसर पर मुस्लिम लीग के प्रदर्शनकर्ताओं ने केवल दूसरे साम्प्रदाय के लोगों को ही जान व माल का नुक़सान पहुँचाया। अंग्रेज़ी या विदेशी शासन के प्रति उन्होंने किसी प्रकार का रोष व्यक्त नहीं किया। इन घटनाओं के फलस्वरूप दो दिन में लगभग ५,००० व्यक्ति जिनमें पुरुष व महिलायें व बच्चे शामिल थे, मारे गये और लगभग १५,००० लोगों को गम्भीर रूप से चोटें आईं। शासन की ओर से इनको रोकने के कोई उपाय नहीं किये गये और न अंग्रेज़ गवर्नर, जो उस समय कलकत्ते में ही थे, उन्होंने ही कोई हस्तक्षेप किया। दो दिन के इस हत्याकाण्ड के बाद तीसरे दिन दूसरे साम्प्रदाय वालों ने भी मारकाट आरम्भ कर दी। तब गवर्नर ने फ़ौज को बुलाकर शान्ति स्थापना कराई। पर इससे पहले कि शान्ति स्थापित हो, बहुतों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। यह देखकर मुस्लिम लीग ने नोआखाली में, जो बाद में पूर्वी पाकिस्तान में शामिल हो गया, जहाँ हिन्दू अल्प संख्या में थे, उन पर आक्रमण कर अन्धाधुन्द मार काट शुरू कर दी जो गांव-गांव दूर-दूर तक फैल गई।
नोआखाली में मारकाट
गांधी जी उस समय देहली में थे। कैबिनेट मिशन के सदस्य भी वहाँ उपस्थित थे। इन घटनाओं के समाचारों से प्रभावित हो वह तुरन्त कलकत्ता के लिए रवाना हो गये जहाँ उन्होंने सभी साम्प्रदाय के लोगों से बातचीत कर शान्ति के वातावरण को लाने की अपील की और अपना अनशन आरम्भ कर दिया। जब कलकत्ते में शान्ति स्थापित हो गई तब गांधी जी देहली वापिस चले आये। लेकिन नोआखाली की घटनाओं की खबर पाकर वह फिर वहाँ के लिए रवाना हो गये और अनेक साथियों सहित गांव-गांव घूमकर लोगों को शान्त करने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया।
बंगाल में भुखमरी १९४२-४३ में
सोहरावर्दी की ही मुस्लिम लीग मिनिस्ट्री के कार्य काल में १९४२ के अन्त में व १९४३ के प्रारम्भ में जबरदस्त सूखा पड़ जाने के कारण भुखमरी से लाखों मनुष्यों की जानें चली गईं। मिनिस्ट्री ने कोई विशेष प्रबन्ध ऐसी स्थिति से निपटने के लिए नहीं किये। केन्द्र सरकार, जो अंग्रेज़ी सरकार थी, उसने भी इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया। वायसराय ने स्वयं बंगाल जाकर और गम्भीर स्थिति को अपनी आँख से देखने का भी कष्ट नहीं किया।
वायसराय की ओर से चुप्पी और सोहरावर्दी को खुली छूट
बंगाल में यह सब काण्ड हुए जिनके कारण मार काट, धन माल का नुक़सान शान्ति व्यवस्था का लोप हुआ, उस सब को रोकने के लिए वायसराय लार्ड वेवल ने कोई कदम नहीं उठाये। उन्होंने सोहरावर्दी को अपनी तरफ़ से जो चाहें वह करें, इसकी खुली छूट दे दी। ऐसा मालूम होता था उनके हाथ पैर फूल गये। मुस्लिम लीग की ओर से इस प्रकार की शरारत से भरी कार्यवाहियों की अवहेलना करते रहे।
वेवल के स्थान पर लार्ड माउन्टबेटन की नियुक्ति
यह सब देखकर गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार का ध्यान तार द्वारा आकर्षित किया कि वह वेवल को तुरन्त वापस बुला ले और किसी और को उनके स्थान पर नियुक्ति करे। महात्मा गांधी के तार से प्रभावित होकर अथवा अन्य कारणों से ब्रिटिश सरकार ने, जो उस समय लेबर की सरकार थी, लार्ड वेवल को वापस बुला लिया और लार्ड माउन्टबेटन को नियुक्त कर भारतवर्ष भेज दिया। लार्ड माउन्टबेटन भारतवर्ष के अन्तिम वायसराय बने। वह शाही ख़ानदान के थे और कन्ज़रवेटिव पार्टी को भी मान्य थे।
केन्द्र में अस्थाई सरकार की स्थापना और उसके द्वारा शान्ति स्थापित करने के प्रयत्न
कलकत्ता व नोआखाली के मारकाट काण्डों की प्रतिक्रिया बिहार में भी शुरू हो गई। वहाँ भी साम्प्रदायिक भावनाओं से प्रेरित होकर मारकाट चल पड़ी। यद्यपि प्रान्त में कांग्रेस सरकार स्थापित हो चुकी थी पर अधिकांश जिलों में कलेक्टर अंग्रेज़ ही थे जिन्होंने उपद्रवों को रोकने के लिए विशेष रूप से कड़े कदम नहीं उठाये। तब तक केन्द्र में कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव के आधार पर अस्थाई सरकार पं० जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में स्थापित हो चुकी थी। स्वयं जवाहर लाल नेहरू, राजेन्द्र बाबू, खान अब्दुल गफ़्फ़ार खाँ ने वहाँ आकर शान्ति स्थापित करने का वातावरण तैयार किया। बाद को नोआखाली से महात्मा गांधी भी वहाँ आ गये और पीड़ित लोगों में जाकर उनको सान्त्वना दी। गांधी जी की उपस्थिति ने बंगाल में जादू का सा असर डाला, जहाँ पुलिस, फ़ौज, शासन सभी असफल हो गये वहाँ केवल महात्मा गांधी के व्यक्तित्व ने, उनकी वाणी ने चमत्कार करके दिखला दिया। थोड़े समय के लिए लोगों के हृदय परिवर्तित हो गये। शान्ति व्यवस्था पुनः कायम हो गई पर मुस्लिम लीग के ज़हरीले, घृणा से भरे हुए हिंसात्मक आन्दोलन का सभी क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ा।
मुस्लिम लीग की ओर से घृणा व हिंसात्मक प्रचार व कार्य
फ्रन्टियर प्रान्त व पंजाब विशेष रूप से प्रभावित हुये। उन्होंने अल्पसंख्यकों को भारी मात्रा में हताहत करना शुरू कर दिया, उनका सब धन माल लूट लिया। वैसे तो भारत वर्ष के सभी भागों पर इनका असर पड़ा पर विशेष रूप से उत्तर भारत ने एक अग्निकाण्ड का रूप धारण कर लिया। मुस्लिम लीग के अनुयायी आपे से बाहर हो गये। जो चाहे वह करते। मुस्लिम जनता अधिकांश में मुस्लिम लीग के हाथों में खेल रही थी। किसी प्रकार का उनको भय नहीं रहा था। उत्तर प्रदेश में तब कांग्रेस की सरकार कायम हो चुकी थी। यहाँ की मुस्लिम लीग का यह गढ़ माना जाता था। यहाँ की मुस्लिम लीग की ओर से पीर पुर रिपोर्ट के नाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित हो चुकी थी, जिसमें कांग्रेस के खिलाफ़ सरासर गलत व निराधार आरोप लगाये जा रहे थे कि कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों पर घोर अत्याचार किये हैं। उस समय के गवर्नर सर हैरी हेग ने भारतवर्ष से इंग्लैण्ड वापस जाने के पश्चात अपने एक भाषण में इन आरोपों का खण्डन कर उनको गलत बताया और कहा कि कांग्रेस सरकार ने उस समय बड़ी बुद्धिमत्ता से काम किया और उसका रवैया पक्षपात रहित व न्याय पूर्ण रहा। पर मुस्लिम लीग अपनी ज़िद पर अड़ी रही और घृणा से भरा हुआ हिंसात्मक प्रचार करती ही रही। कांग्रेस सरकार को हर समय चुनौती देती व उसका तिरस्कार करती।
बदायूँ जिले के चन्दोई व रुदायन ग्रामों में हिंसात्मक घटनायें
ऐसी अवस्था में जब समूचे उत्तर भारत में साम्प्रदायिक भावनायें तीव्रगति से फैली हुई थीं, बदायूँ जिले के पच्छिम क्षेत्र में चन्दोई व रुदायन ग्रामों में, जो थाना इस्लाम नगर से सम्बंधित है, झगड़ा फ़साद व मारकाट की घटनायें हुईं। इन घटनाओं की ख़बर लगते ही रघुवीर सहाय, जिनका चुनाव उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए पूर्वीय क्षेत्र से हुआ था, तुरन्त अपने क्षेत्र में तहसील दातागंज के एक किनारे से दौरा करने के लिए निकल पड़े। जहाँ जहाँ भी वह गये इन्होंने सबको साम्प्रदायिक एकता व शान्ति के वातावरण को बनाये रखने के लिए कहा।
रफ़ी अहमद किदवई का बदायूँ पहुँच जाना, स्लार्क का सतर्कता से प्रबन्ध
इधर इन घटनाओं की ख़बर जब लखनऊ पहुँची तो रफ़ी अहमद किदवई, जो उस समय पुलिस मिनिस्टर थे, वह स्वयं जगन प्रसाद रावत अपने पार्लियामेन्ट्री सेक्रेटरी के साथ बदायूँ पहुँच गये थे। रघुवीर सहाय को जब यह मालूम हुआ कि रफ़ी साहब बदायूँ आ गये हैं तो उन्होंने अपना आगे का दौरा स्थगित कर दिया और बदायूँ पहुँच गये। वह फिर रफ़ी साहब के साथ चन्दोई व रुदायन गये और वहाँ का सब हाल मालूम किया। इस समय बदायूँ में कलक्टर स्लार्क बड़ी तत्परता से काम कर रहे थे। रात दिन वह अपनी जीप पर बैठकर शहर व देहात में चक्कर लगाते। लोगों से मिलते जुलते, बात चीत करते। उनको हर प्रकार का आश्वासन देते। उन्होंने मुस्लिम लीग को बदायूँ में सर नहीं उठाने दिया। बड़े सतर्क होकर काम करते रहे और सशस्त्र पुलिस और फ़ौज की एक टुकड़ी को बरेली से बुला लिया।
रघुवीर सहाय ने पुनः दौरा आरम्भ कर दिया। मंदरा गांव में चिल्ल-पुकार
रफ़ी साहब के बदायूँ से चले जाने के बाद रघुवीर सहाय ने पुनः अपना दौरा आरम्भ कर दिया। गांव गांव जाकर लोगों को आपस में मिल जुल कर रहने की सलाह देते। इसी भ्रमण के दौरान जब एक दिन वह स्वामी श्यामानन्द के साथ उसहत की ओर से ककराला की तरफ़ बैलगाड़ी पर सफ़र कर रहे थे एक गांव की ओर से रोने चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी। यह गांव मंदरा था। गांव की ओर जब वह मुड़े तब देखा कि फ़ौज के कुछ सिपाही हथियार लिये हुये गांव की ओर जा रहे थे। मकानों की छतों पर औरतें और बच्चे चिल्ल-पुकार कर रहे हैं। गांव में पहुँचने पर मालूम हुआ कि फ़ौज के सिपाहियों को कलेक्टर ने यहाँ के लोगों की रक्षा हेतु भेजा है। पर उनको देखकर गांव के लोग भयभीत हो छतों पर चढ़ कर चिल्ल-पुकार करने लगे। रघुवीर सहाय व स्वामी श्यामानन्द ने उनको समझाया बुझाया कि वह फ़ौज के सिपाही हैं, उनकी रक्षा हेतु भेजे गये हैं, डरने की कोई बात नहीं है। तब उन लोगों को इत्मीनान हुआ और छतों पर से उतर कर नीचे आये। मंदरा से आगे चलकर जब कस्बा ककराले पहुँचे तब उन्होंने वहाँ हिन्दू व मुसलमानों को इकट्ठा कर समझाया और सलाह दी कि वह टोलियाँ बनाकर सारे इलाके में गश्त करने के लिये निकल पड़ें और शान्ति व्यवस्था कायम करने के लिये कहें व समझायें। इसके फलस्वरूप उल्फतराय व मुबारक अली खाँ, जो दोनों ककराले के प्रमुख व्यक्तियों में से थे, आस पास के इलाके घूमने निकल पड़े जिसका बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा।
सिसइयाँ गांव में मारधाड़ व ठाकुर पहाड़ सिंह द्वारा बचाव
फिर भी इस क्षेत्र के एक गांव सिसइयाँ में एक काण्ड हो गया जिसकी तुरन्त रोक थाम की गई। इस गाँव में अधिकतर मुसलमान ही रहते थे। एक रोज़ शरारत पसन्द लोगों ने उनके घरों में घुसकर आक्रमण कर दिया और अनेक लोगों की हत्या कर डाली। शोर होने पर समीप के गांव म्याऊ, जो उस क्षेत्र का एक बड़ा ग्राम है उसके ठाकुर पहाड़ सिंह यह आवाज़ सुनकर तुरन्त अपनी बन्दूक लेकर व अन्य साथियों सहित उस गांव की ओर बढ़े और जोर-जोर से कहना शुरू कर दिया कि 'डरना मत हम आ रहे हैं' यह कहते-कहते वह गाँव में पहुँच गये। शरारत पसन्द लोग भागने लगे। इस हंगामे में ये लोग एक हत्यारे को गिरफ़्तार कर अपने साथ ले आये और बाद को पुलिस को दे दिया। बाद को ठाकुर पहाड़ सिंह के लिए इस प्रशंसनीय कार्य के वास्ते कलेक्टर ने एक राइफल का लाइसेंस मंज़ूर किया।
गांधी जी की भेंट लार्ड माउन्टबेटन से
लार्ड माउन्टबेटन के भारतवर्ष में पहुँचने पर महात्मा गांधी उनसे मिलने के लिए ३० मार्च १९४७ को पटना से रवाना होकर देहली पहुँच गये। वह वायसराय से मिले। और इस भेंट के उपरान्त वह वहाँ लगभग १५ दिन तक रुके। वहाँ से वापस होकर वह पुनः बिहार पहुँच गये। जहाँ २४ मई तक अपने शांति प्रचार कार्य में व्यस्त रहे। मुस्लिम लीग की ओर से देश व्यापी हत्याकाण्डों की घटनाओं को देखकर यह बात प्रत्यक्ष नज़र आने लगी कि मुस्लिम लीग देश के विभाजन पर तुली हुई है। बिना टुकड़े किये हुये वह न स्वयं चैन से बैठेगी और न दूसरों को बैठने देगी। देश में शान्ति व्यवस्था को कायम रखना असम्भव प्रतीत होने लगा। देश की इन सब परिस्थितियों की सूचना ब्रिटिश सरकार को वायसराय से प्राप्त हो रही थी। तब उन्होंने २० फरवरी १९४७ को एक घोषणा में बताया कि ब्रिटिश सरकार जून १९४८ से पहले ही भारतवर्ष के हाथों में शासन की बाग डोर देकर चली जायेगी। उन क्षेत्रों के प्रतिनिधि जो संविधान बनाने वाली सभा में भाग लेने को तैयार हैं वह अपने-अपने प्रान्तों के साथ केन्द्रीय शासन में सम्मिलित कर लिये जायेंगे। जिन प्रान्तों के प्रतिनिधि भाग नहीं लेंगे उनके क्षेत्रों को पृथक कर प्रान्तों के हवाले कर दिया जायेगा। इस घोषणा से भी यह आभास होता था कि ब्रिटिश शासन भी देश के विभाजन की बात सोच रहा है। मुस्लिम लीग ने जो दंगे फ़साद मार काट लार्ड वेवल के शासन काल में शुरू कर दिये थे उनको लार्ड माउन्ट बेटन के आने पर भी जारी रखा।
लार्ड माउन्ट बेटन की घोषणा और देश का विभाजन
इन सब घटनाओं के बाद लार्ड माउन्ट बेटन ने शुरू जून १९४७ में एक घोषणा कर बताया कि भारतवर्ष का विभाजन दो भागों में इस प्रकार किया जायेगा कि जिन भागों में अधिकांश हिन्दू रहते हैं वह एक भाग में और जिनमें मुसलमान रहते हैं वह दूसरे भाग में शामिल कर दिये जायेंगें। फ्रन्टियर प्रान्त व आसाम प्रान्त के सिलहट जिले में मतगणना कराई जावेगी।
गांधी जी द्वारा विभाजन का विरोध
कांग्रेस कार्य कारिणी की बैठक इन प्रस्तावों पर विचार करने के लिए बुलाई गई। गांधी जी ने भी उसमें भाग लिया और प्रस्तावों का जोरदार विरोध किया। सदस्यों में से केवल खान अब्दुल गफ़्फ़ार खाँ ने गांधी जी का समर्थन किया। अन्य सब प्रस्तावों के समर्थन में रहे।
कांग्रेस के अन्य नेताओं की ओर से विभाजन को स्वीकार करना मजबूरी से
पं० जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, राजेन्द्र बाबू, आचार्य कृपालानी और अन्य सदस्य, जिन्होंने इन प्रस्तावों का समर्थन गांधी जी के विरोध में होते हुए भी किया, उसका कारण यह था कि मुस्लिम लीग द्वारा जो देश व्यापी हत्या काण्ड हो रहे थे और जिनको रोके जाने की कोई आशा उस समय न थी, वह इतने दुखी व परेशान हो गये थे कि उन्होंने इन सबके बदले देश का विभाजन स्वीकार कर लिया। यद्यपि कोई भी इसको चित्त से नहीं चाहता था। इन प्रस्तावों के स्वीकार करने के पश्चात १५ अगस्त, १९४७ को देश को दो भागों में बांट दिया गया, एक भारतवर्ष दूसरा पाकिस्तान, दोनों ही स्वतंत्र रूप से संसार के सामने प्रकट हुये।
विभाजन के उपरान्त देश की भयानक स्थिति
इस तरह पर 'अंग्रेज़ो भारत छोड़ो' आन्दोलन सफल हुआ और देश को आज़ादी प्राप्त हुई पर स्वतंत्रता मिलने पर लोगों को खुशी नहीं हुई क्योंकि इधर स्वतंत्रता की घोषणा हो रही थी तो दूसरी ओर फ्रन्टियर, पंजाब, सिंध से सताये हुये हिन्दू भारी संख्या में भाग कर भारतवर्ष की ओर आ रहे थे। साथ ही साथ उत्तर प्रदेश के रहने वाले अधिकांश मुसलमान व पंजाब के पूर्वीय भाग के रहने वाले मुसलमान पाकिस्तान की ओर भाग रहे थे। एक भयानक स्थिति उपस्थित हो रही थी। शरणार्थियों ने, जो विपदायें उन पर बीती थीं, जब उनका वर्णन यहाँ के लोगों के सम्मुख सुनाया तो उनकी आँखों में आँसू आ जाते। कितनी ही स्त्रियों के पति व बच्चे पाकिस्तान में खतम कर दिये गये थे। अनेक पुष्पों की स्त्रियाँ खतम हो चुकी थीं। इनका सर्वस्व धन दौलत लूट लिया गया था। बहुतेरी स्त्रियों का सतीत्व लूटा गया था। अनेक स्त्रियाँ हरण कर ली गई थीं, जिनको पाकिस्तान में ही रोक रखा था। मकान, खेती, कारोबार इत्यादि सब पाकिस्तान में छोड़ यहाँ भाग कर आये थे। उनके चेहरों से दहशत टपकती थी। किस तरह उनको यहाँ बसाया जाय और कैसे उनके लिए खाने, पीने, वस्त्र आदि की व्यवस्था की जाये, यह सब समस्यायें शासन के सामने खड़ी हो गईं। इधर मुसलमान भयभीत होकर अपना कारबार छोड़कर पाकिस्तान की ओर भागने लगे। यद्यपि उनके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ था और न आगे इसकी सम्भावना थी, क्योंकि शासन की ओर से उनकी रक्षा हेतु उचित प्रबन्ध किये गये थे, पर पाकिस्तान जाने की प्रवृत्ति फैल चुकी थी। भारी संख्या में लोग जाने लगे थे। शहर में कई मुहल्ले खाली हो गये। बहुतेरे बाद में पाकिस्तान से वापस आ गये और अपने अपने मकानों पर फिर से कब्ज़ा कर लिया। वह भी महसूस करते थे कि जो कुछ भी हुआ है वह उन्हीं के पागलपन के कारण हुआ है। वह सब ही पाकिस्तान की माँग की दुहाई देते थे पर कदापि यह नहीं समझते थे कि पाकिस्तान बनने से उनको अपना परिवार छोड़ना पड़ेगा। वह अब यह महसूस करने लगे कि पाकिस्तान मँहगा पड़ा।