स्थापना १९७४
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अध्याय 9 / 11

बदायूँ जिले के कुछ विशिष्ट स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

यह पुस्तक १९७४ में हिंदी में लिखी गई थी और यहाँ ठीक वैसे ही प्रस्तुत है जैसे प्रकाशित हुई थी — इसका अनुवाद नहीं किया गया है। मेनू व नेविगेशन भाषा बदलते हैं; पुस्तक का पाठ नहीं बदलता।

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मुंशी मंगलसेन

बदायूँ में कांग्रेस कमेटी की स्थापना १९२० में हुई। तभी से मुं० मंगलसेन उसमें शामिल हो गए। मुख्तारकारी को त्याग दिया। १९२१-२२ व १९३० के असहयोग व नमक सत्याग्रह आन्दोलनों में सक्रिय भाग लेकर जेल गये। बदायूँ जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर मरण पर्यन्त रहे। बदायूँ आर्य समाज के प्रधान भी रहे। संस्कृत, फ़ारसी, अरबी के विद्वान थे। कवि भी थे और शायर भी। ताजीरात हिन्द का उर्दू में अनुवाद किया। अष्टाध्यायी का हिन्दी में अनुवाद किया। बाल कथा माला संस्कृत में लिखी। संस्कृत में उनका तख़ल्लुस, 'मंगल' व उर्दू में 'फ़ारिग़' था। बड़ी सरल प्रकृति के थे और अक्सर रघुवीर सहाय से पूछा करते थे कि 'रघुवीर क्या स्वराज्य मिल जायगा?' पर उनके जीवन काल में स्वराज्य नहीं प्राप्त हो सका। उनकी मृत्यु १९४२ में हुई। उस समय उनकी अवस्था ७२ वर्ष की थी।

मास्टर जंग बहादुर जौहरी

मास्टर जंग बहादुर ने बदायूँ हाई स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर १९१६ में विद्यार्थियों के प्राइवेट कोचिंग के लिए 'गोखले मेमोरियल स्कूल' के नाम से एक स्कूल स्थापित किया। स्कूल के लिए स्थानीय हाई स्कूल के हेड मास्टर का संरक्षण प्राप्त होता रहा। बाद को जब बदायूँ में कांग्रेस कमेटी की स्थापना सन् १९२३ में हो गई तब मास्टर साहब भी उसमें शामिल हो गये। स्कूल बन्द कर दिया और अपना सारा समय कांग्रेस के कार्यालय की देखरेख, हिसाब किताब के रखने इत्यादि में देते रहे। १९२०-२१, १९३०, १९४०-४१ और ४२ के आन्दोलनों में सक्रिय भाग लिया और लम्बी-लम्बी सजायें काटीं।

मास्टर जंग बहादुर अविवाहित रहे। लगभग ८० वर्ष की आयु पाई। नमक व शक्कर का प्रयोग नहीं करते थे न अन्न ही लेते थे। केवल हरी तरकारी, सस्ते देशी फल, दूध, शहद का प्रयोग किया। प्राकृतिक चिकित्सा में विश्वास करते थे। किसी प्रकार की औषधि का प्रयोग जीवन पर्यन्त नहीं किया। ईश्वर पर अटूट विश्वास था। जीवन पर्यन्त खद्दरधारी रहे।

नमक सत्याग्रह जो गुलड़िया ग्राम में हुआ और जिसमें रुहेलखण्ड के सभी जिलों ने भाग लिया, उसके संचालन में मास्टर जंग बहादुर का प्रमुख हाथ रहा। जब १९७२ के अन्त में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखने की बात चली तो रघुवीर सहाय को अपने पास से १३ फ़ोटोग्राफ़ दिये जो इतिहास में शामिल किये गये हैं। इन फ़ोटोज़ से उस समय के वातावरण का परिचय मिलता है। मास्टर साहब खामोश तथा शान्त प्रकृति के थे। लिखने पढ़ने, हिसाब किताब रखने अथवा स्कीम बनाने के कार्य में अत्यन्त निपुण थे। धार्मिक विचार तथा सात्विक जीवन के अनुयायी रहे। उनकी आवश्यकतायें कम से कम थीं। जीवन पर्यन्त उन्होंने कोई पद ग्रहण नहीं किया, यद्यपि सार्वजनिक संस्थाओं से निकट सम्बंध रखते थे। चौधरी तुलसी राम ने बदायूँ में खद्दर के प्रचार हेतु मास्टर जंग बहादुर द्वारा 'जौहरी एण्ड गुप्ता' के नाम से एक दुकान स्थापित कराई जो इस समय भी हाथ के बुने हुये वस्त्रों का क्रय विक्रय करती है।

जिला बदायूँ के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी (ग्रूप फ़ोटो)

जिला बदायूँ के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी — ग्रूप फ़ोटो

बायें से बैठे हुए :— लक्ष्मन दत्त, डा० पृथ्वी राज सिंह, सेठ दामोदर स्वरूप, रघुवीर सहाय।

खड़े हुए :— चौ० राम लाल, कु० रुकुम सिंह, चौ० तुलसी राम।

चौधरी तुलसी राम

चौधरी साहब ग्राम टीकरी कलाँ जिला देहली के रहने वाले थे। इन्ट्रैन्स तक शिक्षा प्राप्त कर रेली ब्रादर्स की कम्पनी में नौकरी कर ली। बाद को अपना निजी व्यापार रुई का गंज डुंडआरा जिला एटा में आरम्भ किया। १९१६ में साबरमती सेवाश्रम में जाकर रहे और गांधी जी के विचारों से प्रभावित हुये। वहाँ से वापस आकर बदायूँ जिले में उभयानी को अपना मुख्य केन्द्र बना उन्होंने व्यापार शुरू कर दिया। १९२० में कांग्रेस में शामिल होकर १९२१-२२, १९३०-१९३२-३३, १९४१ व १९४२ के आन्दोलनों में सक्रिय भाग लिया और जेल गये।

उभयानी में खद्दर उत्पादन केन्द्र कायम कर खादी भंडार स्थापित किया जो कुछ समय बाद मेरठ खादी आश्रम ने अपने संरक्षण में ले लिया। बदायूँ में जब ग्राम सुधार का काम आरम्भ हुआ तो उसमें पानी पीने के लिए पक्के कुओं के बनाने के काम में विशेष रूप से रुचि ली। सारे जिले में उन्हीं की देख रेख में तीन साल की अवधि में २२४ कुएँ तामीर कराये गये। जिनमें से १४० हरिजनों के लिये व ८४ दूसरे लोगों के वास्ते थे।

पांडिचेरी में अरविन्द आश्रम से १९४४ में सम्पर्क स्थापित किया। १९३६ में 'क्रिमनल ट्राइब्स सैटलमेन्ट' गोरखपुर की व्यवस्था की। १९४५ में कस्तूरबा बालिका आश्रम ओखला का संचालन किया। १९४७ में जिला विकास बोर्ड बदायूँ के अध्यक्ष हुए बाद को १९५२ के आम चुनाव में उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य चुने गये। १९५४ के मई मास में विधान सभा के अधिवेशन से वापस आने पर वह गंडहा ग्राम पहुँचे तो उनका स्वर्गवास हो गया। इस ग्राम से वह विशेष प्रेम रखते थे। वहाँ पंडित निरन्जन लाल ने अपने ही आम के बाग में उनकी समाधि बनवा दी है।

पंडित निरन्जन लाल

दातागंज, तहसील जिला बदायूँ के प्रमुख जमींदारों में से थे। समाज सेवा का उनको शुरू से ही शौक था। जब जिले में ग्राम सुधार योजना चालू हुई तो उसमें आरम्भ से ही भरसक योगदान दिया। अपने ग्राम गंडहा में जूनियर हाई स्कूल कायम किया, पंचायत घर का निर्माण कराया और एक औषधालय कायम किया। निजी पूँजी से इन सबकी इमारतें बनवाईं।

१९४१ के सत्याग्रह आन्दोलन में सक्रिय भाग लेकर जेल गये। उस समय उनको ६ माह की कड़ी सज़ा हुई और ५००) रु० जुर्माने डाले गये जो तुरन्त ही वसूल कर लिए गये। अपनी गिरफ़्तारी से पहले बन्दूक का लैसन्स सरकार को वापस कर दिया। इसी प्रकार १९४२ में गिरफ़्तार हुये और नज़रबन्द रहे। स्वभाव के बड़े सरल थे। सारे क्षेत्र में बड़ी ऊँची दृष्टि से देखे जाते थे। चौधरी तुलसी राम जी से उन्हें विशेष अनुराग था। चौधरी साहब भी उनको बड़ा स्नेह करते थे। १९५४ में जब वह विधान सभा के अधिवेशन से लौटकर गंडहा पहुँचे तब वहीं उनका देहावसान हो गया। पं० निरंजन लाल ने अपने आम के बाग में उनकी अन्त्येष्टि कराई और समाधि बनवाई।

श्री विनोबा भावे के बदायूँ आने के समय पं० निरन्जन लाल ने ग्राम ननाई में १२ एकड़ भूमि भूदान आन्दोलन में उनको अर्पण की। वह सब जमीन अब वही लोग जोत रहें हैं जिनको तक़सीम कर दी गई थी। लखनऊ के 'नेशनल हेरेल्ड' के लिए उन्होंने २००) रु० बाबू मोहन लाल सक्सेना को, जो हेरेल्ड के डाइरेक्टरों में थे, दिये और उसके शेयर होल्डर बनाये गये। एक नया गांव अपनी जमींदारी की जमीन पर 'निरंजन नगला' के नाम से बसाया। उसमें पानी पीने के दो पुख्ता कुएँ अपने पैसे से निर्माण कराये और अधिक पिछड़े हुए लोगों को आर्थिक सहायता देकर गांव में बसाया।

कुँवर रुकुम सिंह

कुँवर रुकुम सिंह के पिता श्री केहरी सिंह नगला शर्क़ी के एक प्रमुख जमींदार थे। पहलवान के नाम से मशहूर थे। उनको अन्त तक कुश्ती लड़ने का शौक रहा।

कुँवर रुकुम सिंह ने इन्ट्रेंस तक शिक्षा पाई। आर्य समाजी विचार के थे। १९२० से पहले वह ग्राम में आनरेरी मुन्सिफ़ थे। पर वह पद १९२०-२१ के असहयोग आन्दोलन के समय त्याग दिया। जब प्रथम बार माण्टेगू चेम्स फोर्ड स्कीम के आधार पर निर्वाचन कराये गये जिनका कांग्रेस ने बहिष्कार किया तो उस समय डार्लिंग कलेक्टर के कहने पर भी अपना पर्चा दाखिल करने पर तैयार नहीं हुये। १९२१ के आन्दोलन में जेल गये। १९३० में नमक कानून भंग होते समय वह गुलड़िया में स्वयं उपस्थित रहे और पहली नमक की कड़ाई उन्होंने ही आग की भट्ठी पर से उतारी। वह फिर जेल गये। थोड़े से काल के लिये वे 'देवास राज' चले गये। जहाँ महाराज के सलाहकार के रूप में काम किया। बाद को बदायूँ आकर डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के चुनाव लड़कर चेयर मैन डिस्ट्रिक्ट बोर्ड बने। १९४१ के व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लेकर फिर जेल गये और उसके बाद १९४२ में नज़र बन्द रखे गये।

१९३७ में उ० प्र० विधान सभा के सदस्य चुने गये। तदोपरान्त १९६२ में फिर विधान सभा में भेजे गये और वहाँ १९६७ तक सदस्य रहे। अपने ग्राम नगला शर्क़ी में वैदिक हाई स्कूल का निर्माण किया और महिलाओं के लिए भी स्कूल कायम किया। यह दोनों ही संस्थायें अब उनके पुत्र राजेन्द्र सिंह व पुत्री विद्यावती राठौर की देख रेख में चलायी जा रही हैं।

१९३८ में स्थानीय अंग्रेज़ कलेक्टर के अन्याय पूर्ण आदेशों के विरोध में समूचा गांव नगला शर्क़ी खाली करके वहाँ से २ मील की दूरी पर जंगल में जाकर बस गये। जब वह आदेश हटा लिये गये तब सारा गांव लौटकर फिर बस गया।

चौधरी बदन सिंह

स्कूल की शिक्षा चन्दौसी हाई स्कूल में पाई। राजनीति में १९२० में प्रवेश किया। तब से बराबर १९२०-२१, १९३०-३१, १९४१ व १९४२ के आन्दोलनों में सक्रिय भाग लेकर जेल जाते रहे। १९२३ में स्वराज्य पार्टी की ओर से उत्तर प्रदेश कौंसिल के लिए सदस्य चुने गये। फिर १९२६ के चुनाव में भी सफल हुये। बदायूँ डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के भी सदस्य रहे। १९३७ में उ० प्र० विधान सभा के सदस्य चुने गये थे। बाद को १९४५-४६ में भी चुने गये। तत्पश्चात १९५२-६२ तक लोक सभा के लिए चुन कर भेजे गये। १९४२ के आन्दोलन में अपने अनेक साथियों सहित फ़रारी हालत में रह कर तोड़-फोड़ के कार्यों का संचालन किया। मुरादाबाद जिले में मछुरिया काण्ड के बाद गिरफ़्तार हुये। कई साल नज़रबन्द रखे गये और मुकदमों में सज़ा भी हुई।

उनकी विशेष रुचि बदायूँ के पुराने इतिहास की खोज करने में रहती थी, इसके लिए उन्होंने काफ़ी सामग्री भी संग्रहित की और अनेक लेख भी लिखे। जैसे 'भुड़िया धुरे की' 'लशान गृह' व 'सरसौता' के बारे में, जो अब उनकी सुपुत्री शान्ति देवी सदस्य विधान सभा उ० प्र० के पास है। लखनऊ में जब तक विधान सभा के सदस्य रहे लखनऊ म्युज़ियम में जाते रहे और जिला बदायूँ की खुदाई से प्राप्त चीज़ों का अध्ययन करते रहे।

बदायूँ जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कई साल तक रहे। लोगों से मिलकर उनको मित्र बना लेना उनका विशेष गुण था। अपनी तहसील गुन्नौर के श्री बाबूराम सिंह को सलाह देकर बरेली में हाई स्कूल स्थापित कराया, जो बाद में इण्टर कालेज बन गया। उसकी कार्यकारिणी के अध्यक्ष कई वर्ष तक रहे।

पंडित त्रिवेनी सहाय

पं० त्रिवेनी सहाय का जन्म ग्राम आसफ़पुर में एक ब्राह्मण परिवार में २८-२-१९१० को हुआ। उन्होंने संस्कृत, उर्दू, अंग्रेज़ी की शिक्षा प्राप्त की। प्रथम बार वह १९३० में नमक सत्याग्रह में भाग लेकर जेल गये। उसके उपरान्त व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन में १९४० में जेल गये, तत्पश्चात १९४२ के आन्दोलन में फ़रार रहकर मछुरिया स्टेशन काण्ड में भाग लिया। १९४३ में गिरफ़्तार हुये और नज़रबन्द कर दिये गये। १९६५ में गुड़ आन्दोलन के सिलसिले में मेरठ में गिरफ़्तार हुये। उनकी प्रवृति रचनात्मक कार्यों की ओर अधिक होने के कारण १९३६ में गांधी सेवा सदन आश्रम की स्थापना आसफ़पुर में हुई जिसमें श्री प्रभुदास गांधी का सहयोग प्राप्त हुआ। आश्रम के संचालन का कार्य-भार स्वयं सँभाला। आश्रम से ही सम्बंधित कृषि यन्त्र निर्माण, सर्वोदय कार्य, बी० डी० सी० प्रशिक्षण केन्द्र तथा विकास खण्ड व चिकित्सा केन्द्र की भी स्थापना कराई जो सभी संस्थायें इस समय भी चल रही हैं।

१९५६ में अखिल भारतीय सर्वोदय सम्मेलन आसफ़पुर में कराया, जिसमें बाबा राघव दास विशेष अतिथि के रूप में आये थे। उनका निधन २५-२-७२ को हुआ। आश्रम के ही प्रांगण में उनकी प्रतिमा का अनावरण १४-२-७२ को श्री धर्मदत्त वैद्य द्वारा कराया गया। आश्रम खादी उत्पादन का कार्य इस समय भी कर रहा है।